धूप बहुत है-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 4

धूप बहुत है-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 4

दुआओं में वह तुम्हें याद करने वाला है

दुआओं में वह तुम्हें याद करने वाला है
कोई फ़क़ीर की इमदाद करने वाला है

ये सोच-सोच के शर्मिन्दगी-सी होती है
वह हुक्म देगा जो फ़रियाद करने वाला है

ज़मीन ! हम भी तेरे वारिसों में हैं कि नहीं
वह इस सवाल को बुनियाद करने वाला है

यही ज़मीन मुझे गोद लेने वाली है
ये आसमां मेरी इमदाद करने वाला है

ये वक़्त तू जिसे बरबाद करता रहता है
ये वक़्त ही तुझे बरबाद करने वाला है

ख़ुदा दराज़ करे उम्र मेरे दुश्मन की
कोई तो है जो मुझे याद करने वाला है

दरबदर जो थे वह दीवारों के मालिक हो गये

दरबदर जो थे वह दीवारों के मालिक हो गये
मेरे सब दरबान, दरबारों के मालिक हो गये

लफ़्ज़ गूँगे हो चुके, तहरीर अंधी हो चुकी
जितने मुख़बिर थे वे अख़बारों के मालिक हो गये

लाल सूरज आसमां से घर की छत पर आ गया
जितने थे बेकार सब कारों के मालिक हो गये

और अपने घर में हम बैठे रहे मशअल बकफ़
चन्द जुगनू चांद और तारों के मालिक हो गये

देखते ही देखते कितनी दुकानें खुल गईं
बिकने आए थे वह बाज़ारों के मालिक हो गये

सर बकफ़ थे तो सरों से हाथ धोना पड़ गया
सर झुकाए थे वह दस्तारों के मालिक हो गये

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं

नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है
ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं

रोज़ हम इस अँधेरी धुँध के पार
क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं

धूप इतनी कराहती क्यों है
छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं

टुकटुकी बाँध ली है आँखों ने
रास्ते वापसी के देखते हैं

पानियों से तो प्यास बुझती नहीं
आइए ज़हर पी के देखते हैं

शजर हैं अब समर आसार मेरे

शजर हैं अब समर आसार मेरे
उगे आते हैं दावेदार मेरे

मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे
मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे

यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं
समुंदर हैं समुंदर पार मेरे

अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें
अगर चाहें तो ये बीमार मेरे

हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन
गए बेकार सारे वार मेरे

मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ
यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे

हँसी में टाल देना था मुझे भी
ख़ता क्यूँ हो गए सरकार मेरे

तसव्वुर में न जाने कौन आया
महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे

तुम्हारा नाम दुनिया जानती है
बहुत रुस्वा हैं अब अशआर मेरे

भँवर में रुक गई है नाव मेरी
किनारे रह गए इस पार मेरे

मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ
अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं

काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं
और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं

आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत
हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं

हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है
हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं

देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की
आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं

ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने
बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं

एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे
उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं

सब को रुस्वा बारी बारी किया करो

सब को रुस्वा बारी बारी किया करो
हर मौसम में फ़तवे जारी किया करो

रातों का नींदों से रिश्ता टूट चुका
अपने घर की पहरे-दारी किया करो

क़तरा क़तरा शबनम गिन कर क्या होगा
दरियाओं की दावे-दारी किया करो

रोज़ क़सीदे लिक्खो गूँगे बहरों के
फ़ुर्सत हो तो ये बेगारी किया करो

शब भर आने वाले दिन के ख़्वाब बुनो
दिन भर फ़िक्र-ए-शब-बेदारी किया करो

चाँद ज़ियादा रौशन है तो रहने दो
जुगनू-भय्या जी मत भारी किया करो

जब जी चाहे मौत बिछा दो बस्ती में
लेकिन बातें प्यारी प्यारी किया करो

रात बदन-दरिया में रोज़ उतरती है
इस कश्ती में ख़ूब सवारी किया करो

रोज़ वही इक कोशिश ज़िंदा रहने की
मरने की भी कुछ तय्यारी किया करो

ख़्वाब लपेटे सोते रहना ठीक नहीं
फ़ुर्सत हो तो शब-बेदारी किया करो

काग़ज़ को सब सौंप दिया ये ठीक नहीं
शेर कभी ख़ुद पर भी तारी किया करो

तेरे वादे की तेरे प्यार की मोहताज नहीं

तेरे वादे की तेरे प्यार की मोहताज नहीं
ये कहानी किसी किरदार की मोहताज नहीं

आसमां ओढ़ के सोए हैं खुले मैदां में
अपनी ये छत किसी दीवार की मोहताज नहीं

ख़ाली कशकौल पे इतराई हुई फिरती है
ये फ़क़ीरी किसी दस्तार की मोहताज नहीं

ख़ुद कफ़ीली का हुनर सीख लिया है मैंने
ज़िन्दगी अब किसी सरकार की मोहताज नहीं

मेरी तहरीर है चस्पां मेरी पेशानी पर
अब जुबां ज़िल्लत-ए-इज़हार की मोहताज नहीं

लोग होंठों पे सजाए हुए फिरते हैं मुझे
मेरी शोहरत किसी अख़बार की मोहताज नहीं

रोज़ आबाद नये शहर किया करती है
शायरी अब किसी दरबार की मोहताज नहीं

मेरे अख़लाक़ की एक धूम है बाज़ारों में
ये वह शय है जो ख़रीदार की मोहताज नहीं

इसे तूफ़ां ही किनारे से लगा देते हैं
मेरी कश्ती किसी पतवार की मोहताज नहीं

मैंने मुल्कों की तरह लोगों के दिल जीते हैं
ये हुकूमत किसी तलवार की मोहताज नहीं

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