धूप बहुत है-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 3

धूप बहुत है-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 3

सबब वह पूछ रहे हैं उदास होने का

सबब वह पूछ रहे हैं उदास होने का
मिरा मिज़ाज नहीं बेलिबास होने का

नया बहाना है हर पल उदास होने का
ये फ़ायदा है तिरे घर के पास होने का

महकती रात के लम्हो ! नज़र रखो मुझ पर
बहाना ढूँढ़ रहा हूँ उदास होने का

मैं तेरे पास बता किस ग़रज़ से आया हूँ
सुबूत दे मुझे चेहरा-शनास होने का

मिरी ग़ज़ल से बना ज़ेहन में कोई तस्वीर
सबब न पूछ मिरे देवदास होने का

कहाँ हो आओ मिरी भूली-बिसरी यादो आओ
ख़ुश-आमदीद है मौसम उदास होने का

कई दिनों से तबीअ’त मिरी उदास न थी
यही जवाज़ बहुत है उदास होने का

मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर
मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का

मिरे लबों से तबस्सुम मज़ाक़ करने लगा
मैं लिख रहा था क़सीदा उदास होने का

पता नहीं ये परिंदे कहाँ से आ पहुँचे
अभी ज़माना कहाँ था उदास होने का

मैं कह रहा हूँ कि ऐ दिल इधर-उधर न भटक
गुज़र न जाए ज़माना उदास होने का

धूप बहुत है मौसम जल थल भेजो ना

धूप बहुत है मौसम जल थल भेजो न
बाबा मेरे नाम का बादल भेजो न

मौल्सरी की शाख़ों पर भी दिए जलें
शाख़ों का केसरिया आँचल भेजो न

नन्ही-मुन्नी सब चहकारें कहाँ गईं
मोरों के पैरों की पायल भेजो न

बस्ती-बस्ती दहशत किसने बो दी है
गलियों-बाज़ारों की हलचल भेजो न

सारे मौसम एक उमस के आदी हैं
छाँव की ख़ुशबू, धूप का संदल भेजो न

मैं बस्ती में आख़िर किस से बात करूँ
मेरे जैसा कोई पागल भेजो न

दाव पर मैं भी, दाव पर तू भी है

दाव पर मैं भी, दाव पर तू भी है
बेख़बर मैं भी, बेख़बर तू भी

आस्मां ! मुझसे दोस्ती करले
दरबदर मैं भी, दरबदर तू भी

कुछ दिनों शहर की हवा खा ले
सीख जायेगा सब हुनर तू भी

मैं तेरे साथ, तू किसी के साथ
हमसफ़र मैं भी हमसफ़र तू भी

हैं वफ़ाओं के दोनों दावेदार
मैं भी इस पुलसिरात पर, तू भी

ऐ मेरे दोसत ! तेरे बारे में
कुछ अलग राय थी मगर, तू भी

अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं

अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं
घर के हालात घर से पूछते हैं

क्यूँ अकेले हैं क़ाफ़िले वाले
एक-एक हमसफ़र से पूछते हैं

कितने जंगल हैं इन मकानों में
बस यही शहर भर से पूछते हैं

यह जो दीवार है यह किस की है
हम इधर वह उधर से पूछते हैं

हैं कनीज़ें भी इस महल में क्या
शाहज़ादों के डर से पूछते हैं

क्या कहीं क़त्ल हो गया सूरज
रात से रात-भर से पूछते हैं

जुर्म है ख़्वाब देखना भी क्या
रात-भर चश्म-ए-तर से पूछते हैं

ये मुलाक़ात आख़िरी तो नहीं
हम जुदाई के डर से पूछते हैं

कौन वारिस है छाँव का आख़िर
धूप में हम-सफ़र से पूछते हैं

ये किनारे भी कितने सादा हैं
कश्तियों को भँवर से पूछते हैं

वो गुज़रता तो होगा अब तन्हा
एक-इक रहगुज़र से पूछते हैं

क्या कभी ज़िंदगी भी देखेंगे
बस यही उम्र-भर से पूछते हैं

ज़ख़्म का नाम फूल कैसे पड़ा
तेरे दस्त-ए-हुनर से पूछते हैं

पाँव से आसमान लिपटा है

पाँव से आसमान लिपटा है
रास्तों से मकान लिपटा है

रौशनी है तेरे ख़यालों की
मुझसे रेशम का थान लिपटा है

कर गये सब किनारा कश्ती से
सिर्फ़ इक बादवन लिपटा है

दे तवानाईयां मेरे माबूद !
जिस्म से ख़ानदान लिपटा है

और मैं सुन रहा हूँ क्या-क्या कुछ
मुझसे एक बेजुबान लिपटा है

सारी दुनिया बुला रही है मगर
मुझसे हिन्दोस्तान लिपटा है

शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर

शराब छोड़ दी तुमने कमाल है ठाकुर
मगर ये हाथ में क्या लाल लाल है ठाकुर

कई मलूल से चेहरे तुम्हारे गाँव में हैं सुना है
तुम को भी इस का मलाल है ठाकुर

ख़राब हालों का जो हाल था ज़माने से
तुम्हारे फैज़ से अब भी बहाल है ठाकुर

इधर तुहारे ख़ज़ाने जवाब देते हैं
उधर हमारी अना का सवाल है ठाकुर

किसी गरीब दुपट्टे का कर्ज़ है इस पर
तुम्हारे पास जो रेशम की शाल है ठाकुर

तुम्हारी लाल हवेली छुपा न पाएगी
हमे ख़बर है कहाँ कितना माल है ठाकुर

दुआ को नन्हे गुलाबों ने हाथ उठाये हैं
बस अब यहाँ से तुम्हारा जवाल है ठाकुर

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए
ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए

शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं
शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए

मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है
मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए

मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में
तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए

ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में
ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए

मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

मेरी तेज़ी, मेरी रफ़्तार हो जा

मेरी तेज़ी, मेरी रफ़्तार हो जा
सुबक रौ, उठ कभी तलवार हो जा

अभी सूरज सदा देकर गया है
ख़ुदा के वास्ते बेदार हो जा

है फ़ुर्सत तो किसी से इश्क कर ले
हमारी ही तरह बेकार हो जा

तेरी दुश्मन है तेरी सादालौही
मेरी माने तो तू कुछ दुशवार हो जा

शिकस्ता कश्तियों से क्या उम्मीदें
किनारे सो रहे हैं, पार हो जा

तुझे कया दर्द की लज़्ज़त बताएँ
मसीहा ! आ कभी बीमार हो जा

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