धूप-कृष्णा-उत्सवा-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

धूप-कृष्णा-उत्सवा-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

इस कोमल गान्धार धूप को
कभी अपने अंगों पर धारा है?
प्रतिदिन पीताम्बरा यह
वैष्णवी
किसके अनुग्रह सी
आकाशों में देववस्त्रों सी
अकलंक बनी रहती है?
सम्पूर्ण वानस्पतिकता
पीत चन्दन लेपित
उदात्त माधवी वैष्णवता लगती है।
मेरा यह कैसा अकेलापन
जो इस वैश्विक उत्सवता से वंचित है।
इस गौरा, साध्वी-धूप को
कभी अपने पर कण्ठी सा धारा है?
इस कोमल गान्धार धूप को
कभी अपने अंगों पर धारा है?
पत्र लिखी रम्या यह
धूप
स्वयं वृक्ष हो जाती है,
वाचाली हवाएँ तब
वृक्ष नहीं, पात नहीं
धूप ही हिलाती हैं।
नदियों
पहाड़ों
वनखण्डियों में
धूप की तुलसी उन्मत्त किये देती है,
कैसी केवड़े की गन्ध ही अकेली
धूप-कृष्णा का नाम ले
मन को वृन्दा किये देती है।
इस प्रभुरूपा राधा-धूपा को
कभी ठाकुर कह बाँशी में पुकारा है?
इस कोमल गान्धार धूप को
कभी अपने अंगों पर धारा है?

 

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