धुंध-अनंतिम_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

धुंध-अनंतिम_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

वह धुंध जो हवा के पर्दो में कोहरे की है
जो उस अरण्य की है जिसमें मैं अकेला छूट जाता हूँ
वह जो मेरी चेतना पर पड़ी असंख्य छायाओं की है
वह धुंध जो सूक्तियों में है और उतर आई है प्रार्थनाओं में
जिसके पार न आवाज़ जाती है न रोशनी
वह धुंध जो ज्ञान के असीम प्रकाश की रेख में छिप रही है
और घुल रही है आनेवाले दिनों की आकांक्षा में
वह जो चीजों में नहीं उनकी आभा में रहती है

वह जो विस्मृत होती जा रही स्मृति की है
और अपने रहस्य से बनाती है दुनिया को धुंधला
जिसमें से गुज़रते हैं तमाम मनुष्य
जो पशुओं का जीवन नहीं बनाती दुष्कर
वह धुंध जो सोख लेती है समुद्र में गिरती आकाश की परछाईं का रंग
वह धुंध जिसमें से एक धुन निकल जाती है तीर की तरह

रोज़ उसीके पार जाता हूँ मैं।

 

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