धार खंजर की-नानक सिंह -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nanak Singh

धार खंजर की-नानक सिंह -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nanak Singh

सुना है तेज़ करते हैं दोबारा धार खंजर की।
करेंगे आजमाइश क्या मुकर्रर वो मेरे सिर की।

सबब पूछा तो यों बोले नहीं जाहिर खता कोई,
मगर कुछ दीख पड़ती है शरारत दिल के अंदर की।

उजाड़े घोंसले कितने चमन बर्बाद कर डाले,
शरारत उसकी नस-नस में भरी है खूब बंदर की।

चलेंगी कब तलक देखें ये बन्दर घुरकियां उन की,
नचाएगी उन्हें भी एक दिन लकड़ी कलंदर की।

मेरे दर्द-ए-जिगर में, आह में, नाले में, शीवन में,
नजर आती है हर जा सूरते जालिम सितमगर की।

खामीदा करके गर्दन को कहां तंग आजमाई हो,
रहेगी कब्जा-ए-कातिल में खाली मूठ खंजर की।

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