धार के इधर उधर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 6

धार के इधर उधर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 6

बुलबुले हिन्द

[सरोजिनी नायडू की मृत्यु पर]

1
हो गई मौन बुलबुले-हिंद!

मधुबन की सहसा रुकी साँस,
सब तरुवर-शाखाएँ उदास,
अपने अंतर का स्वर खोकर
बैठे हैं सब अलि विहग-वृंद!
चुप हुई आज बुलबुले-हिन्द!
2
स्वर्गिक सुख-सपनों से लाकर
नवजीवन का संदेश अमर
जिसने गाया था जीवन भर
मधु ऋतु की जाग्रत वेला में
कैसे उसका संगीत बन्द!
सो गई आज बुलबुले-हिन्द!
3
पंछी गाने पर बलिहारी,
पर आज़ादी ज़्यादा प्यारी,
बंदी ही हैं जो संसारी,
तन के पिंजड़े को रिक्त छोड़
उड़ गया मुक्त नभ में परिंद!
उड़ गई आज बुलबुले-हिंद!

गणतंत्र दिवस

1
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,
कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए,
इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े,
और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए!
किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
2
जय बोलो उस धीर व्रती की जिसने सोता देश जगाया,
जिसने मिट्टी के पुतलों को वीरों का बाना पहनाया,
जिसने आज़ादी लेने की एक निराली राह निकाली,
और स्वयं उसपर चलने में जिसने अपना शीश चढ़ाया,
घृणा मिटाने को दुनियाँ से लिखा लहू से जिसने अपने,
“जो कि तुम्हारे हित विष घोले, तुम उसके हित अमृत घोलो।”
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
3
कठिन नहीं होता है बाहर की बाधा को दूर भगाना,
कठिन नहीं होता है बाहर के बंधन को काट हटाना,
ग़ैरों से कहना क्या मुश्किल अपने घर की राह सिधारें,
किंतु नहीं पहचाना जाता अपनों में बैठा बेगाना,
बाहर जब बेड़ी पड़ती है भीतर भी गाँठें लग जातीं,
बाहर के सब बंधन टूटे, भीतर के अब बंधन खोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
4
कटीं बेड़ियाँ औ’ हथकड़ियाँ, हर्ष मनाओ, मंगल गाओ,
किंतु यहाँ पर लक्ष्य नहीं है, आगे पथ पर पाँव बढ़ाओ,
आज़ादी वह मूर्ति नहीं है जो बैठी रहती मंदिर में,
उसकी पूजा करनी है तो नक्षत्रों से होड़ लगाओ।
हल्का फूल नहीं आज़ादी, वह है भारी ज़िम्मेदारी,
उसे उठाने को कंधों के, भुजदंडों के, बल को तोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

ओ मेरे यौवन के साथी

1
मेरे यौवन के साथी, तुम
एक बार जो फिर मिल पाते,
वन-मरु-पर्वत कठिन काल के
कितने ही क्षण में कह जाते।
ओ मेरे यौवन के साथी!
2
तुरत पहुंच जाते हम उड़कर,
फिर उस जादू के मधुवन में,
जहां स्वप्न के बीज बिखेरे
थे हमने मिट्टी में, मन में।
ओ मेरे यौवन के साथी!
3
सहते जीवन और समय का
पीठ-शीश पर बोझा भारी,
अब न रहा वह रंग हमारा,
अब न रही वह शक्ल हमारी।
ओ मेरे यौवन के साथी!
4
चुप्पी मार किसी ने झेला
और किसी ने रोकर, गाकर,
हम पहचान परस्पर लेंगे
कभी मिलें हम, किसी जगह पर।
ओ मेरे यौवन के साथी!
5
हम संघर्ष काल में जन्मे
ऐसा ही था भाग्य हमारा,
संघर्षों में पले, बढ़े भी,
अब तक मिल न सका छुटकारा।
ओ मेरे यौवन के साथी!
6
औ’ करते आगाह सितारे
और बुरा दिन आने वाला,
हमको-तुमको अभी पड़ेगा
और कड़ी घड़ियों से पाला।
ओ मेरे यौवन के साथी!
7
क्या कम था संघर्ष कि जिसको
बाप और दादों ने ओड़ा,
जिसमें टूटे और बने हम
वह भी था संघर्ष न थोड़ा।
ओ मेरे यौवन के साथी!
8
और हमारी संतानों के
आगे भी संघर्ष खड़ा है,
नहीं भागता संघर्षों से
इसीलिए इंसान बड़ा है।
ओ मेरे यौवन के साथी!
9
लेकिन, आओ, बैठ कभी तो
साथ पुरानी याद जगाएं,
सुनें कहानी कुछ औरों की
कुछ अपनी बीती बतलाएं।
ओ मेरे यौवन के साथी!
10
ललित राग-रागिनियों पर है
अब कितना अधिकार तुम्हारा?
दीप जला पाए तुम उनसे?
बरसा सके सलिल की धारा?
ओ मेरे यौवन के साथी!
11
मोहन, मूर्ति गढ़ा करते हो
अब भी दुपहर, सांझ सकारे?
कोई मूर्ति सजीव हुई भी?
कहा किसी ने तुमको ’प्यारे’?
ओ मेरे यौवन के साथी!
12
बतलाओ, अनुकूल कि अपनी
तूली से तुम चित्र-पटल पर
ला पाए वह ज्योति कि जिससे
वंचित सागर, अवनी, अंबर?
ओ मेरे यौवन के साथी!
13
मदन, सिद्ध हो सकी साधना
जो तुमने जीवन में साधी?
किसी समय तुमने चाहा था
बनना एक दूसरा गांधी!
ओ मेरे यौवन के साथी!
14
और कहाँ, महबूब, तुम्हारी
नीली, आंखों वाली ज़ोहरा,
तुम जिससे मिल ही आते थे,
दिया करे सब दुनिया पहरा।
ओ मेरे यौवन के साथी!
15
क्या अब भी हैं याद तुम्हें
चुटकुले, कहानी किस्से, प्यारे,
जिनपर फूल उठा करते थे
हँसते-हँसते पेट हमारे।
ओ मेरे यौवन के साथी!
16
हमें समय ने तौला, परखा,
रौंदा, कुचला या ठुकराया,
किंतु नहीं वह मीठी प्यारी
यादों का दामन छू पाया।
ओ मेरे यौवन के साथी!
17
अक्सर मन बहलाया करता
मैं यों करके याद तुम्हारी,
तुमको भी क्या आती होगी
इसी तरह से याद हमारी?
ओ मेरे यौवन के साथी!
18
मैं वह, जिसने होना चाहा
था रवि ठाकुर का प्रतिद्वन्दी,
और कहां मैं पहुंच सका हूँ
बतलाएगी यह तुकबंदी।
ओ मेरे यौवन के साथी!

होली

यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,

आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर को!

निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,

आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!

प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,

जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!

शहीदों की याद में

1
सुदूर शुभ्र स्वप्न सत्य आज है,
स्वदेश आज पा गया स्वराज है,
महाकृत्घन हम बिसार दें अगर
कि मोल कौन
आज का
गया चुका।
2
गिरा कि गर्व देश का तना रहे,
मरा कि मान देश का बना रहे,
जिसे खयाल था कि सिर कटे मगर
उसे न शत्रु
पांव में
सके झुका।
3
रुको प्रणाम इस ज़मीन को करो,
रुको सलाम इस ज़मीन को करो,
समस्त धर्म-तीर्थ इस ज़मीन पर
गिरा यहां
लहू किसी
शहीद का।

अमित के जन्म-दिन पर

अमित को बारंबार बधाई!
आज तुम्हारे जन्म-दिवस की,
मधुर घड़ी फिर आई।
अमित को बारंबार बधाई!

उषा नवल किरणों का तुमको
दे उपहार सलोना,
दिन का नया उजाला भर दे
घर का कोना-कोना,
रात निछावर करे पलक पर
सौ सपने सुखदायी।
अमित को बारंबार बधाई!

जीवन के इस नये बरस में
नित आनंद मनाओ,
सुखी रहो तन-मन से अपनी
कीर्ति-कला फैलाओ,
तुम्हें सहज ही में मिल जाएं
सब चीजें मन-भायी।
अमित को बारंबार बधाई!

अजित के जन्म-दिन पर

आज तुम्हारा जन्म-दिवस है,
घड़ी-घड़ी बहता मधुरस है,
अजित हमारे, जियो-जियो!

अमलतास पर पीले-पीले,
गोल्ड-मुहर पर फूल फबीले,
आज तुम्हारा जन्म-दिवस है,
जगह-जगह रंगत है, रस है,
अजित दुलारे, जियो-जियो!

बागों में है बेला फूला,
लतरों पर चिड़ियों का झूला,
आज तुम्हारा जन्म-दिवस है,
मेरे घर में सुख-सरबस है,
नैन सितारे, जियो-जियो!

नये वर्ष में कदम बढ़ाओ,
पढ़ो-बढ़ो यश-कीर्ति कमाओ,
तुम सबके प्यारे बन जाओ,
जन्म-दिवस फिर-फिर से आए,
दुआ-बधाई सबकी लाए,
सबके प्यारे, जियो-जियो!

राजीव के जन्मदिन पर

आज राजीव का जन्म-दिन आ गया,
सौ बधाई तुम्हें,
सौ बधाई तुम्हें।
आज आनन्द का घन गगन छा गया,
सौ बधाई तुम्हें,
सौ बधाई तुम्हें।
दे बधाई तुम्हें आज प्रातः किरण,
दे बधाई तुम्हें आज अम्बर-पवन,
दे बधाई तुम्हें भूमि होकर मगन।
फूल कलियां खिलें,
आज तुमको सभी की दुआएँ मिलें,
तुम लिखो, तुम पढ़ो,
खूब आगे बढ़ो,
खूब ऊपर चढ़ो,
बाप-मां खुश रहें,
काम ऐसा करो, लोग अच्छा कहें।

भारत-नेपाल मैत्री संगीत

जग के सबसे उँचे पर्वत की छाया के वासी हम।
बीते युग के तम का पर्दा
फाड़ो, देखो, उसके पार
पुरखे एक तुम्हारे-मेरे,
एक हमारे सिरजनहार,
और हमारी नस-नाड़ी में बहती एक लहू की धार।
एक हमारे अंतर्मन पर,
शासन करते भाव-विचार।
आओ अपनी गति-मति जानें,
अपना सच्चा
क़द पहचानें,
जग के सबसे ऊँचे पर्वत की छाया के वासी हम।
पशुपति नाथ जटा से निकले
जो गंगा की पावन धार,
बहे निरंतर, थमे कहीं तो
रामेश्वर के पांव पखार,
गौरीशंकर सुने कुमारी कन्या के मन की मनुहार।
गौतम-गाँधी-जनक-जवाहर
त्रिभुवन-जन-हितकर उद्गार
दोनों देशों में छा जाएँ,
दोनों का सौभाग्य सजाएँ,
दोनों दुनिया
को दिखलायें,
अपनी उन्नति, सबकी उन्नति करने के अभिलाषी हम।
जग के सबसे ऊँचे पर्वत की छाया के वासी हम।
एक साथ जय हिन्द कहें हम,
एक साथ हम जय नेपाल,
एक दूसरे को पहनाएँ
आज परस्पर हम जयमाल,
एक दूसरे को हम भेंटें फैला अपने बाहु विशाल,
अपने मानस के अंदर से
आशंका, भय, भेद निकाल।
खल-खोटों का छल पहचानें,
हिल-मिल रहने का बल जानें,
एक दूसरे
को सम्माने,
शांति-प्रेम से जीने, जीने देने के विश्वासी हम।
जग के सबसे ऊँचे पर्वत की छाया के वासी हम।

नए वर्ष की शुभ कामनाएँ

(वृद्धों को)
रह स्वस्थ आप सौ शरदों को जीते जाएँ,
आशीष और उत्साह आपसे हम पाएँ।

(प्रौढ़ों को)
यह निर्मल जल की, कमल, किरन की रुत है।
जो भोग सके, इसमें आनन्द बहुत है।

(युवकों को)
यह शीत, प्रीति का वक्त, मुबारक तुमको,
हो गर्म नसों में रक्त मुबारक तुमको।

(नवयुवकों को)
तुमने जीवन के जो सुख स्वप्न बनाए,
इस वरद शरद में वे सब सच हो जाएँ।

(बालकों को)
यह स्वस्थ शरद ऋतु है, आनंद मनाओ।
है उम्र तुम्हारी, खेलो, कूदो, खाओ।

गणतन्त्र पताका

उगते सूरज और चांद में जब तक है अरुणाई,
हिन्द महासागर की लहरों में जबतक तरुणाई,
वृद्ध हिमालय जब तक सर पर श्वेत जटाएँ बाँधे,
भारत की गणतंत्र पताका रहे गगन पर छाई।

आजादी की नवीं वर्षगाँठ

आज़ादी के नौ वर्ष मुबारक तुमको,
नौ वर्षों के उत्कर्ष मुबारक तुमको,
हर वर्ष तुम्हें आगे की ओर बढाए,
हर वर्ष तुम्हें ऊपर की ओर उठाए;
गति उन्नति के आदर्श मुबारक तुमको,
बाधाओं से संघर्ष मुबारक तुमको!

सस्मिता के जन्मदिन पर

आओ सब हिल-मिलकर गाएं,
एक खुशी का गीत।

आज किसी का जन्मदिवस है,
आज किसी मन में मधुरस है,
आज किसी के घर आँगन में,
गूँजा है संगीत। आओ०

आज किसी का रूप सजाओ,
आज किसी को खूब हँसाओ,
आज किसी को घेरे बैठे,
उसके सब हित-मीत। आओ०

आज उसे सौ बार बधाई,
आज उसे सौ भेंट सुहाई,
जिसने की जीवन के ऊपर
दस बरसों की जीत। आओ

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