धन्य हो प्रभु! (हमुद)- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

धन्य हो प्रभु! (हमुद)- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई
भभक रहा था ओर छोर हीन मरूस्थल
हज़ारों लाखों सालों से/लक्ष्यहीन सरोकारहीन
जब से धधक रही आँधी में अपनी दिशाहिनता समेट रहा है

गिरगिट को
अपने होने का हर संभव मर्म आज़माना पड़ा
उसकी जीभ के धागे पर
उभर आया काँटा भी
आग भी जाग पड़ी जठर के साए में-
काश कि धुंध ही बाधित करती
बूँद भर कहीं दिप उठती
कोई कीट कहीं लेता करवट

गिरगिट को परखना पड़ा अपना होना अनहोना
उसने दिशाएँ आँखों में भर लीं
अपने माथे पर उभरे पसीने की नमी आँकी
जीभ का प्यासा काँटा भिगोया
अपनी ही दाढ़ों से अपनी केंचुल उतार दी
और किया आहार
धन्य हो प्रभु !
इस अनस्तित्व में भी कोई अस्तित्व बस रहा है
किसी को कोई अभाव नहीं खलता।

अनुवादक : मोहन लाल ‘आश’

 

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