धनी-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

धनी-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

 

धनी

धनियो ! भला कब तक व्यसन की बान छोड़ोगे नहीं,
अब और कब तक अज्ञता की आन तोड़ोगे नहीं ?
किंवा कृपण कब तक रहोगे लोभ को पाले हुए,
क्या तुच्छ धनवाले हुए तुम जो न मनवाले हुए ? ॥१०२॥

कमला-विलास विलोल तर चपला-प्रकाश-समान है,
धन-लाभ का साफल्य बस सत्कार्य विषयक दान है।
हा ! देश का उपकार करना अब तुम्हें कब आयगा ?
विद्या, कला-कौशल बढ़ाओ, धन स्वयं बढ़ जायगा ॥१०३॥

लाखों अपव्यय हैं तुम्हारे एक तो सद्व्यय करो,
चाहो न जो तुम कीर्ति तो अपकीर्ति का तो भय करो।
क्या मातृभूमि वृथा तुम्हारी विश्व में जननी बनी ?
देते करोड़ों देश-हित हैं अन्य देशों के धनी ॥१०४॥

हम पुत्र तीस करोड़ जिसके देश वह दुःखी रहे;
अनुचित नहीं है फिर कहीं कोई हमें जो पशु कहे ।
हे भाइयो ! है दीन देखो, मातृ-भू माता मही,
जो बन पड़े जिससे यहाँ है इस समय थोड़ा वही ॥१०५॥

 

शिक्षा

सब से प्रथम कर्तव्य है शिक्षा बढ़ाना देश में,
शिक्षा बिना ही पड़ रहे हैं आज हम सब क्लेश में ।
शिक्षा बिनाकोई कभी बनता नहीं सत्पात्र है,
शिक्षा विना कल्याण की आशा दुराशा मात्र है ॥१०६॥

जब तक अविद्या का अँधेरा हम मिटावेंगे नहीं,
जब तक समुज्ज्वल ज्ञान का आलोक पावेंगे नहीं।
तब तक भटकना व्यर्थ है सुखसिद्धि के सन्धान में,
पाये बिना पथ पहुँच सकता कौन इष्ट स्थान में ? ॥१०७॥

वे देश जो हैं आज उन्नत और सब संसार से-
चौंका रहे हैं नित्य सबको नव नवाविष्कार से।
बस ज्ञान के सञ्चार से ही बढ़ सके हैं वे वहाँ,
विज्ञान-बल से ही गगन में चढ़ सके हैं वे वहाँ ॥१०८॥

विद्या मधुर सहकार करती सर्वथा कटु निम्ब को,
विद्या ग्रहण करती कलों से शब्द को, प्रतिविम्ब को !
विद्या जड़ों में भी सहज ही डालती चैतन्य है,
हीरा बनाती कोयले को, धन्य विद्या धन्य है॥१०९॥

विद्या दिनों का पथ पलों में पार है करवा रही,
विद्या विविध वैचित्र्य के भाण्डार है भरवा रही।
गति सिद्धि उसकी हो चुकी आकाश में, पाताल में,
है वह मरों को भी जिलाना चाहती कुछ काल में ! ॥११०॥

पाया हमीं से था कभी जो बीज वर विज्ञान का,
उसको दिया है दूसरों ने रूप रम्योद्यान का।
हम किन्तु खो बैठे उसे भी जो हमारे पास था,
हा ! दूसरों की वृद्धि में ही क्या हमारा ह्रास था ! ॥१११॥

 

राष्ट्रभाषा

है राष्ट्रभाषा भी अभी तक देश में कोई नहीं,
हम निज विचार जना सकें जिससे परस्पर सब कहीं।
इस योग्य हिन्दी है तदपि अब तक न निज पद पा सकी,
भाषा बिना भावैकता अब तक न हममें आ सकी? ॥११२॥

यों तो स्वभाषा-सिद्धि के सब प्रान्त हैं साधक यहाँ,
पर एक उर्दूदाँ अधिकतर बन रहे बाधक यहाँ।
भगवान् जाने देश में कब आयगी अब एकता,
हठ छोड़ दो हे भाइयो ! अच्छी नहीं अविवेकता ॥११३॥

 

स्त्री-शिक्षा

विद्या हमारी भी न तब तक काम में कुछ आयगी-
अर्धांगियों को भी सु-शिक्षा दी न जब तक जायगी।
सर्वांग के बदले हुई यदि व्याधि पक्षाघात की-
तो भी न क्या दुर्बल तथा व्याकुल रहेगा वातकी? ॥११४॥

 

समय की अनुकूलता

सुख-शान्ति मय सरकार का शासन समय है अब यहाँ,
सुविधा समुन्नति के लिए है प्राप्त हमको सब यहाँ।
अब भी न यदि कुछ कर सके हम तो हमारी भूल है,
अनुकूल अवसर की उपेक्षा हूलती फिर शूल है ॥११५॥

है ब्रिटिश शासन की कृपा ही यह कि हम कुछ जग गये,
स्वाधीन हैं हम धर्म में, सब भय हमारे भग गये।
निज रूप को फिर हम सभी कुछ कुछ लगे हैं जानने-
निज देश भारतवर्ष को फिर हम लगे हैं मानने ॥११६॥

 

आशा

बीती नहीं यद्यपि अभी तक है निराशा की निशा-
है किन्तु आशा भी कि होगी दीप्त फिर प्राची दिशा।
महिमा तुम्हारी ही जगत् में धन्य आशे ! धन्य है,
देखा नहीं कोई कहीं अवलम्ब तुम-सा अन्य है ॥११७॥

आशे, तुम्हारे ही भरोसे जी रहे हैं हम सभी,
सब कुछ गया पर हाय रे ! तुमको न छोड़ेंगे कभी।
आशे, तुम्हारे ही सहारे टिक रही है यह मही,
धोखा न दीजो अन्त में, बिनती हमारी है यही ॥११८॥

यद्यपि सफलता की अभी तक सरसता चक्खी नहीं,
हम किन्तु जान रहे कि वह श्रम के बिना रक्खी नहीं।
यद्यपि भयंकर भाव से छाई हुई है दीनता-
कुछ कुछ समझने हम लगे हैं किन्तु अपनी हीनता ॥११९॥

यद्यपि अभी तक स्वार्थ का साम्राज्य हम पर है बना-
पर दीखते हैं साहसी भी और कुछ उन्नतमना।
बन कर स्वयंसेवक सभी के जो उचित हित कर रहे,
होकर निछावर देश पर जो जाति पर हैं मर रहे ॥१२०॥

फैला निरुद्यम सब कहीं, हैं किन्तु ऐसे भी अभी-
जिनका उपार्जन भोगते हैं देशवासी जन सभी।
यद्यपि अधिक जन भाग्य को ही कोसते हैं क्लेश में-
उच्चाभिलाषी वीर भी हैं किन्तु कुछ कुछ देश में ॥१२१॥

है हीन शिक्षा की दशा, पर दृष्टि उस पर भी गई;
फैला रहा है धूम हिन्दू-विश्वविद्यालय नई।
श्री मालवीय-समान नेता, भूप मिथिलेश्वर यथा,
देशार्थ भिक्षुक बन रहे हैं, धन्य हैं वे सर्वथा ॥१२२॥

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