धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन ੴ सतिगुर प्रसादि-शब्द -भक्त त्रिलोचन जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Bhakt Trilochan Ji

धनासरी बाणी भगतां की त्रिलोचन ੴ सतिगुर प्रसादि-शब्द -भक्त त्रिलोचन जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Bhakt Trilochan Ji

नाराइण निंदसि काइ भूली गवारी ॥
दुक्रितु सुक्रितु थारो करमु री ॥१॥ रहाउ ॥
संकरा मसतकि बसता सुरसरी इसनान रे ॥
कुल जन मधे मिल्यि​ो सारग पान रे ॥
करम करि कलंकु मफीटसि री ॥१॥
बिस्व का दीपकु स्वामी ता चे रे सुआरथी पंखी राइ गरुड़ ता चे बाधवा ॥
करम करि अरुण पिंगुला री ॥२॥
अनिक पातिक हरता त्रिभवण नाथु री तीरथि तीरथि भ्रमता लहै न पारु री ॥
करम करि कपालु मफीटसि री ॥३॥
अम्रित ससीअ धेन लछिमी कलपतर सिखरि सुनागर नदी चे नाथं ॥
करम करि खारु मफीटसि री ॥४॥
दाधीले लंका गड़ु उपाड़ीले रावण बणु सलि बिसलि आणि तोखीले हरी ॥
करम करि कछउटी मफीटसि री ॥५॥
पूरबलो क्रित करमु न मिटै री घर गेहणि ता चे मोहि जापीअले राम चे नामं ॥
बदति त्रिलोचन राम जी ॥६॥१॥६९५॥

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