द्वारकाधीश- सुदामा-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

द्वारकाधीश- सुदामा-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

(द्वारकाधीश) सुदामा

अरी राम कह, वन-सा यह घर
छोड़ कहां मैं जाऊँ?
उस आनन्दकन्द को कैसे
तेरी व्यथा सुनाऊँ?

जगती में रह कर जगती की
बाधा से डरती है?
करनी तो अपनी है धरनी,
असन्तोष करती है?

आने-जाने वाली बातें
आती हैं-जाती हैं,
तू अलिप्त रह उनसे, पर से
पर की वे थाती हैं।

जिनके बाहर के सुख-वैभव
हैं तेरे मनमानें,
डाह न कर उन पर, भीतर वे
कैसे हैं, क्या जानें!

क्या धनियों के यहाँ दूसरी
कुसुम-कली खिलती है?
वही चाँदनी वही धूप क्या
मुझे नहीं मिलती है?

मेरे लिए कौन-सा नभ का
रत्न नहीं बिखरा है?
एक वृष्टि में ही हम सबका
देह-गेह निखरा है।

क्या धनियों के लिए दूसरी
धरती की हरियाली?
या गिरि-वन, निर्झर-नदियों की
उनकी छटा निराली?

शीतल-मन्द-सुगंध-वायु क्या
यहाँ नहीं बहता है?
केवल वातावरण हमारा
भिन्न भिन्न रहता है ।

फिर भी एक पवन में दोनों
आश्वासी जीते हैं,
शुभे, हमारे ही घट का वे
शीतल जल पीते हैं।

धनी स्वादु से, दीन क्षुधा से
जो कुछ भी खाते हैं,
किन्तु अन्त में तृप्ति एक ही
वे दोनों पाते हैं।

आंगन लीप देहली की जब
पूजा करने आती,
जल, अक्षत, या फूल चढ़ा कर
गुन गुन कर कुछ गाती।

मत्था टेक अन्त में जब तू
मग्न वहाँ हो जाती,
तब न समाकर ऋद्धि जगत में
कहां ठौर है पाती ?

आग्रह छोड़ वहां जाने का
वह है यहीं, हृदय में
विघ्न बनूं कैसे मैं जाकर
उसके लीलालय में?

अपनी ही चिन्तायों से तू
चैन नहीं लेती है।
जिस पर है भू-भार उसी के
घर धरना देती है?

अपने लिये नहीं जो अधुना
वही चाहिए तुझको,
होता तो मिलता, होगा तो
आप मिलेगा मुझको।

जिसे किसी ने कभी न चाहा,
वह तूने पाया है,
अरी विपत्ति न कह, यह प्रभु की
ममता है, माया है।

वह दुख मेरे सिर-माथे है,
यह अभाव मन-भाया,
कृपया प्रभु की ओर मुझे जो,
ले जाने को आया।

ईर्ष्या-लोभ-मुक्त होता यदि,
मन यह तेरा मानी,
तो दारिद्रय-मूर्ति, मैं तुझ पर
आज वारता रानी।

उसके घर के सभी भिखारी?
यह सच है तो जाऊँ,
पर क्या माँग तुच्छ विषयों की
भिक्षा, उसे लजाऊँ?

प्रभु की दया-भागिनी है यह
दरिद्रता ही मेरी।
यह भी रही न हाय कहीं तो,
फिर सब और अंधेरी ।

विभव-शालिनी इस वसुधा पर
क्या अभाव है धन का,
पाया परम्परागत मैंने
दुर्लभ-साधन मन का ।

मैं उस कुल का हूं विश्रुत है
त्याग और तप जिसका,
मुझको न हो, किन्तु तुझको भी
गर्व नहीं क्या इसका?

तू तो कोई राज-सुता है
ब्राह्मण के घर आई,
हाय बड़ाई है जो मेरी,
तुझको वही न भाई।

पर मानिनी क्यों भिक्षा का धन
तुझको नहीं अखरता?
क्षात्र दर्प तो ईश्वर से भी
नहीं याचना करता!

अपना राजस खो बैठी है
तू मेरे घर आकर,
क्या निज सत्व मुझे भी खोना
होगा तुझको पाकर ?

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