द्वन्द्व गीत-रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar Part 3

द्वन्द्व गीत-रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar Part 3

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यात्री हूँ अति दूर देश का,
पल-भर यहाँ ठहर जाऊँ,
थका हुआ हूँ, सुन्दरता के
साथ बैठ मन बहलाऊँ;
’एक घूँट बस और’–हाय रे,
ममता छोड़ चलूँ कैसे?
दूर देश जाना है, लेकिन,
यह सुख रोज कहाँ पाऊँ?

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’दूर-देश’–हाँ ठीक, याद है,
यह तो मेरा देश नहीं;
इससे होकर चलो, यहीं तक
रुकने का आदेश नहीं।
बजा शंख, कारवाँ चला,
साकी, दे विदा, चलूँ मैं भी,
कभी-कभी हम गिन पाते हैं
प्रिये! मीन औ’ मेष नहीं।

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सचमुच, मधुफल लिये मरण का
जीवन – लता फलेगी क्या?
आग करेगी दया? चिता में
काया नहीं जलेगी क्या?
कहती है कल्पना, मधुर
जीवन को क्यों कटु अन्त मिले?
पर, जैसे छलती वह सबको
वैसे मुझे छलेगी क्या?

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मधुबाले! तेरे अधरों से
मुझको रंच विराग नहीं,
यह न समझना देवि! कुटिल
तीरों के दिल पर दाग नहीं;
जी करता है हृदय लगाऊँ,
पल – पल चूमूँ, प्यार करूँ,
किन्तु, आह! यदि हमें जलाती
क्रूर चिता की आग नहीं।

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दो कोटर को छिपा रहीं
मदमाती आँखें लाल सखी!
अस्थि – तन्तु पर ही तो हैं
ये खिले कुसुम-से गाल सखी!
और कुचों के कमल? झरेंगे
ये तो जीवन से पहले,
कुछ थोड़ा-सा मांस प्राण का
छिपा रहा कंकाल सखी!

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बचे गहन से चाँद, छिपाऊँ
किधर? सोच चल होता हूँ,
मौत साँस गिनती तब भी जब
हृदय लगाकर सोता हूँ।
दया न होगी हाय, प्रलय को
इस सुन्दर मुखड़े पर भी,
जिसे चूम हँसती है दुनिया,
उसे देख मैं रोता हूँ।

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जाग, देख फिर आज बिहँसती
कल की वही उषा आई,
कलियाँ फिर खिल उठीं, सरित पर
परिचित वही विभा छाई;
रंजित मेघों से मेदुर नभ
उसी भाँति फिर आज हँसा,
भू पर, मानों, पड़ी आज तक
कभी न दुख की परछाईं।

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रँगने चलीं ओस-मुख किरणें
खोज क्षितिज का वातायन,
जानें, कहाँ चले उड़-उड़कर
फूलों की ले गन्ध पवन;
हँसने लगे फूल, किस्मत पर
रोने का अवकाश कहाँ?
बीते युग, पर, भूल न पाई
सरल प्रकृति अपना बचपन।

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मैं भी हँसूँ फूल-सा खिलकर?
शिशु अबोध हो लूँ कैसे?
पीकर इतनी व्यथा, कहो,
तुतली वाणी बोलूँ कैसे?
जी करता है, मत्त वायु बन
फिरूँ; कुंज में नृत्य करूँ,
पर, हूँ विवश हाय, पंकज का
हिमकण हूँ, डोलूँ कैसे?

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शान्त पाप! जग के जंगल में
रो मेरे कवि और नहीं,
सुधा-सिक्त पल ये, आँसू का
समय नहीं, यह ठौर नहीं;
अन्तर्जलन रहे अन्तर में,
आज वसन्त-उछाह यहाँ;
आँसू देख कहीं मुरझें
बौरे आमों के मौर नहीं।

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औ’ रोना भी व्यर्थ, मृदुल जब
हुआ व्यथा का भार नहीं,
आँसू पा बढ़ता जाता है,
घटता पारावार नहीं;
जो कुछ मिले भोग लेना है,
फूल हों कि हों शूल सखे!
पश्चाताप यही कि नियति पर
हमें स्वल्प अधिकार नहीं।

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कौन बड़ाई, चढ़े श्रृंग पर
अपना एक बोझ लेकर!
कौन बड़ाई, पार गये यदि
अपनी एक तरी खेकर?
अबुध-विज्ञ की माँ यह धरती
उसको तिलक लगाती है,
खुद भी चढ़े, साथ ले झुककर
गिरतों को बाँहें देकर।

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पत्थर ही पिघला न, कहो
करुणा की रही कहानी क्या?
टुकड़े दिल के हुए नहीं,
तब बहा दृगों से पानी क्या?
मस्ती क्या जिसको पाकर फिर
दुनिया की भी याद रही?
डरने लगी मरण से तो फिर
चढ़ती हुई जवानी क्या?

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नूर एक वह रहे तूर पर,
या काशी के द्वारों में;
ज्योति एक वह खिले चिता में,
या छिप रहे मजारों में।
बहतीं नहीं उमड़ कूलों से,
नदियों को कमजोर कहो;
ऐसे हम, दिल भी कैदी है
ईंटों की दीवारों में।

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किरणों के दिल चीर देख,
सबमें दिनमणि की लाली रे!
चाहे जितने फूल खिलें
पर, एक सभी का माली रे!
साँझ हुई, छा गई अचानक
पूरब में भी अँधियाली,
आती उषा, फैल जाती
पश्चिम में भी उजियाली रे!

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ठोकर मार फोड़ दे उसको
जिस बरतन में छेद रहे,
वह लंका जल जाय जहाँ
भाई – भाई में भेद रहे।
गजनी तोड़े सोमनाथ को,
काबे को दें फूँक शिवा,
जले कुराँ अरबी रेतों में,
सागर जा फिर वेद रहे।

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रह – रह कूक रही मतवाली
कोयल कुंज-भवन में है,
श्रवण लगा सुन रही दिशाएँ,
स्थिर शशि मध्य गगन में है।
किसी महा – सुख में तन्मय
मंजरी आम्र की झुकी हुई,
अभी पूछ मत प्रिये, छिपी-सी
मृत्यु कहाँ जीवन में है।

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तू बैठी ही रही हृदय में
चिन्ताओं का भार लिये,
जीवन – पूर्व मरण – पर भेदों
के शत जटिल विचार लिये;
शीर्ण वसन तज इधर प्रकृति ने
नूतन पट परिधान किया,
आ पहुँचा लो अतिथि द्वार पर
नूपुर की झंकार किये।

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वृथा यत्न, पीछे क्या छूटा,
इस रहस्य को जान सकें;
वृथा यत्न, जिस ओर चले
हम उसे अभी पहचान सकें।
होगा कोई क्षण उसका भी,
अभी मोद से काम हमें;
जीवन में क्या स्वाद, अगर
खुलकर हम दो पल गा न सकें?

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तुम्हें मरण का सोच निरन्तर
तो पीयूष पिया किसने?
तुम असीम से चकित, इसे
सीमा में बाँध लिया किसने?
सब आये हँस, बोल, सोच,
कह, सुन मिट्टी में लीन हुए;
इस अनन्य विस्मय का सुन्दरि!
उत्तर कहो दिया किसने?

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छोड़े पोथी-पत्र, मिला जब
अनुभव में आह्लाद मुझे,
फूलों की पत्ती पर अंकित
एक दिव्य संवाद मुझे;
दहन धर्म मानव का पाया,
अतः, दुःख भयहीन हुआ;
अब तो दह्यमान जीवन में
भी मिलता कुछ स्वाद मुझे।

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एक – एक कर सभी शिखाओं
को मैं गले लगाऊँगा,
भोगूँगा यातना कठिन
दुर्वह सुख-भार उठाऊँगा;
रह न जाय अज्ञेय यहाँ कुछ,
आया तो इतना कर लूँ;
बढ़ने दो, जीवन के अति से
अधिक निकट मैं जाऊँगा।

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मधु-पूरित मंजरी आम्र की
देखो, नहीं सिहरती है;
चू न जाय रस-कोष कहीं,
इससे मन-ही-मन डरती है!
पर, किशोर कोंपलें विटप की
निज को नहीं संभाल सकीं,
पा ऋतुपति का ताप द्रवित
उर का रस अर्पित करती है।

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प्राणों में उन्माद वर्ष का,
गीतों में मधुकण भर लें;
जड़-चेतन बिंध रहे, हृदय पर
हम भी केशर के शर लें।
यह विद्रोही पर्व प्रकृति का
फिर न लौटकर आवेगा;
सखि! बसन्त को खींच हृदय में
आओ आलिंगन कर लें।

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पहली सीख यही जीवन की,
अपने को आबाद करो,
बस न सके दिल की बस्ती, तो
आग लगा बरबाद करो।
खिल पायें, तो कुसुम खिलाओ,
नहीं? करो पतझाड़ इसे,
या तो बाँधो हृदय फूल से,
याकि इसे आजाद करो।

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मैं न जानता था अबतक,
यौवन का गरम लहू क्या है;
मैं पीता क्या निर्निमेष?
दृग में भर लाती तू क्या है?
तेरी याद, ध्यान में तेरे
विरह-निशा कटती सुख से,
हँसी-हँसी में किन्तु, हाय,
दृग से पड़ता यह चू क्या है?

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उमड़ चली यमुना प्राणों की,
हेम-कुम्भ भर जाओ तो;
भूले भी आ कभी तीर पर
नूपुर सजनि! बजाओ तो।
तनिक ठहर तट से झुक देखो,
मुझ में किसका बिम्ब पड़ा?
नील वारि को अरुण करो,
चरणों का राग बहाओ तो।

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दौड़-दौड़ तट से टकरातीं
लहरें लघु रो-रो सजनी!
इन्हें देख लेने दो जी भर,
मुख न अभी मोड़ो सजनी!
आज प्रथम संध्या सावन की,
इतनी भी तो करो दया,
कागज की नौका में धीरे
एक दीप छोड़ो सजनी!

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प्रकृति अचेतन दिव्य रूप का
स्वागत उचित सजा न सकी,
ऊषा का पट अरुण छीन
तेरे पथ बीच बिछा न सकी।
रज न सकी बन कनक – रेणु,
कंटक को कोमलता न मिली,
पग – पग पर तेरे आगे वसुधा
मृदु कुसुम खिला न सकी।

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अब न देख पाता कुछ भी यह
भक्त विकल, आतुर तेरा,
आठों पहर झूलता रहता
दृग में श्याम चिकुर तेरा।
अर्थ ढूँढ़ते जो पद में,
मैं क्या उनको निर्देश करूँ?
चरण-चरण में एक नाद,
बजता केवल नूपुर तेरा।

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पूजा का यह कनक – दीप
खँडहर में आन जलाया क्यों?
रेगिस्तान हृदय था मेरा,
पाटल – कुसुम खिलाया क्यों?
मैं अन्तिम सुख खोज रहा था
तप्त बालुओं में गिरकर।
बुला रहा था सर्वनाश को
यह पीयूष पिलाया क्यों?

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तुझे ज्ञात जिसके हित इतना
मचा रही कल – रोर, सखी!
खड़ा पान्थ वह उस पथ पर
जाता जो मरघट ओर, सखी!
यह विस्मय! जंजीर तोड़
कल था जिसने वैराग्य लिया,
आज उसी के लिए हुआ
फूलों का पाश कठोर, सखी!

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बोल, दाह की कोयल मेरी,
बोल दहकती डारों पर,
अर्द्ध-दग्ध तरु की फुनगी पर,
निर्जल-सरित-कगारों पर।
अमृत – मन्त्र का पाठ कभी
मायाविनि! मृषा नहीं होता,
उगी जा रहीं नई कोंपलें
तेरी मधुर पुकारों पर।

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