दौर-ए-आइंदा-ग़ज़लें-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja Ghazals

दौर-ए-आइंदा-ग़ज़लें-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja Ghazals

पहले फ़क़त एक वजूद था मेरा, आज-कल ज़िंदा हूँ….
तौहीन-ए-उम्र-ए-गुज़िश्ता पर मैं वाक़ई अब शर्मिंदा हूँ !

ज़मीं से वाबस्ता था, महज़ ज़मीन पर रहा करता था…
आसमाँ की बुलंदियों को छूता अब मन-मौजी परिंदा हूँ !

चंद मेहरबाँ जो मेरे ख़िलाफ़ ता-उम्र साज़िश करते रहे…
जिगर मेरा देखो उन्हीं के शहर का अब भी बाशिंदा हूँ !

पुराने थे ग़ालिबन कभी ख़्यालात मेरे भी तुम्हारी तरह…
अंदाज़ अपना बदल दिया, अब तो मैं दौर-ए-आइंदा हूँ !

मंज़िलें बदलती रहीं, जुस्तजू कोई ना कोई रही मगर…
इन दिनों जल्वा-ए-ख़ुदाई का एक अदना सा जोइंदा हूँ !

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