दो चांद के टुकड़े हैं-गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

दो चांद के टुकड़े हैं-गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

दो चांद के टुकड़े हैं येह रुख़सार नहीं हैं ।
सुर्ख़ होने पि भी नूर हैं येह नार नहीं हैं ।
अब आगे दहन मिलने के आसार नहीं हैं ।
जोगी जिसे पा ले येह वुह असरार नहीं हैं ।
होटों के मुकाबिल में निबात हो नहीं सकती ।
लब मिलते हैं शीरीनी से बात हो नहीं सकती ।

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