दो चट्टानें -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 4

दो चट्टानें -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 4

दो रातें

(एक याद, एक आशंका)

उस दिन भी ऐसी ही
क्रुद्ध, काली, डरावनी,
फुफकारती-सी रात थी;
घुप्प, घिरा, भरा, थर्राया
आसमान था-
रह-रहकर चमकता,
रह-रहकर कड़कता,

जीवन-परीक्षा

और देते ये परीक्षाएँ
उमर ही कट गई है,
हिचकिचाहट, भीति, शंका
सब तरह की हट गई है,
औ’ नतीजे के लिए होता
नहीं चंचल-विकल मन,
सफलता औ’ विफलता के
बीच दूरी घट गई है;
किन्तु निश्चित जानता हूँ
क्रम नहीं यह टूटने का
जब तलक सम्बन्ध साँसों
से जुड़ा है, जब तलक रहना यहां है।
जिन्दगी तो इम्तहाँ-दर-इम्तहाँ है ।

वह परीक्षा भी जिसकी
सब परीक्षाएँ तयारी,
और देने में जिसे मिट
जाएगी काया बिचारी?
जान पाएंगे कभी
परिणाम मेरे बाद वाले ?
और टूटेगी कि टूटेगी नहीं मेरी खुमारी?
जो परीक्षा पूर्व मेरे
दे गए थे, वे बने हैं
एक अबूझ रहस्य, उनकी-सी
तुम्हारी और मेरी दास्तां है।
जिन्दगी इम्तहाँ-दर-इम्तहाँ है ।

 एक फिकर–एक डर

यही घड़ी है बन्धु,
दिल को कड़ा करने की,
यह घड़ी है नहीं, भाई,
याद करने की-
स्वेद-श्रम की धार
रोम-कूपों से निकलती,
देह के ऊपर सरकती;
और अन्तर में करकती;
फेन मुख से विवश निर्गत;
पंथ के कुश-कंकड़ों की पत्थरों की
चुभन, धसन, कठोर-ठोकर से
बहा जो खून,
तलवों, उंगलियों से,
सना मिट्टी से, जमा,
सूखा, बिथा-काला पड़ा;
नस-नस चटकती-सी;
हिली-सी हर एक हड्डी;
और मन टूटा-गिरा-सा;
और छुट्टी हुई हिम्मत;
और हारी-सी तबीयत;-
यह घड़ी है नहीं
यह सब याद करने की,
यह घड़ी है, बंधु
दिल को कड़ा करने की ।

जहाँ पहुंचा हूँ
वहाँ पर पहुंचने को
कब चला था?

और उससे कम नहीं
अंदर चला था ।
और मंज़िल, जिस तरह की भी,
मुझे मन भा रही है ।

सफर लम्बा इस क़दर निकला-
बड़ा खुश हूँ-
कि जो कुछ भी सँजोया
भार इतना लगा,
हल्का हुआ
उसको फेंक-फांक, उतार कर ही ।
कटा अपने-आप फंदा,
आज बंदा है छरिंदा !
और मेरी राह मुश्किल-
बड़ा खुश हूँ-
इस कदर निकली कि साथी
साथ अपने-आप मेरा छोड़ भागे-
यह नहीं आसान धंधा-
कटा अपने-आप फंदा,
आज बंदा है छरिंदा !
पंथ है या मुक्त नभ है,
द्विपद हूँ या हूँ परिंदा !

एक ही मुझको फिकर है,
और कम उसका न डर है,-
जिन पथों-पगडंडियों को
गीत से अपने गुंजाता मैं चला था,
आज उठ उनसे प्रतिध्वनि आ रही है
और मेरा दिल कड़ा जो हो चला था
फिर उसे पिघला रही है!

 माली की साँझ

बटोही की थकन हरते;
कदम्ब, जो पुष्पों के गुच्छों से
आँखों के कांटे निकालते;
अंब, जो अपने फलों से
तन की क्षुधा हरते,
मन को तृप्त करते;
महुए, जो अपने मधु तोय में
कुछ कटुता कुछ कुंठा डुबा लेते न कुछ अर्जित हुआ,
न कुछ अर्पित हुआ,
न दुआ सुनी, न शुक्रिया,
न गर्व ने छेड़ा,
न संतोष ने छुआ,
और अब आई खड़ी जीवन की साँझ है ।
कभी बीज निगल गई
ज़मीन हृदयहीन, कठोर,

कभी नए अँखुयों पर
आसमान हुआ निर्मम,
कभी उठते पौधों के
प्रतिकूल हुआ मौसम,
कभी खा-खूँद गए
सहज भाव से गुज़रते हुए ढोर,

कभी जान-बूझकर
ईर्ष्या और द्वेष भी दिखाते रहे ज़ोर
कभी शहज़ोरी,
कभी चोराचोरी ।
जीवन की श्रम-स्वेद से भरी दुपहरी ने
सनकी चुनौती ली,
किन्तु अब पी ली, पी ली,

आई खड़ी जीवन की साँझ है;
चुका-चुका आज है:
किन्तु कहीं दूर से आती आवाज़ है-
थकी-लटी मिट्टी से अच्छी
नहीं खाद हुआ करती है,
जो न हुए सच्चे उन सपनों से अच्छे
नहीं बीज हुआ करते हैं,
आँसू से सिंचे हुए निश्चय ही
एक दिन उभरते हैं,
सब कर ले, श्रम न हज़म
कर सकती धरती है,
मरने को जीते जो
जीने को मरते हैं,
निश-कालिमा समेट
पात बन बिखरते हैं,
सबसे यह बढ़कर है,
अपने अनुदान से
अनजान बने रहते हैं,
पृथ्वी पर अहं की वे
वृद्धि नहीं करते हैं ।

 दो युगों में

(एक तुलना : एक असंतोष : एक संतोष)

एक युग ने
प्रथम रश्मि का स्वागत किया
और अपने मधुर-मधुर तप के
बल पर
उसे स्वर्ण किरण में बदल दिया ।
एक युग ने

सूर्य का स्वागत किया
पर जब वह मारतंड हुआ,
प्रचण्ड हुआ, प्रखर हुआ,
तब उसने डरकर धूप का चश्मा लगाया,
घबराकर अपने को किसी कोने में छिपा लिया ।

मैं प्रथम रश्मि के आंगन में खेला,
स्वर्ण किरण में नहाया,
पूत हुआ;
सूर्य निकला
तो मैंने काम में हाथ लगाया,
कंठ से राग उठाया ।
मारतंड तपा
तो मैंने उसे सहा,
बहुत स्वेद बहा,
पर मैं लगा रहा ।
और अब मेरा दिन ढलता है,
मेरे जैसों के श्रम से,
संगीत से, कहाँ कुछ बदलता है;
पर इतना भी क्या कम है
कि जब मेरा तन श्रांत है,
मेरा मन शांत है ।

दो बजनिए

“हमारी तो कभी शादी न हुई,
न कभी बारात सजी,
न कभी दूल्‍हन आई,
न घर पर बधाई बजी,
हम तो इस जीवन में क्‍वाँरे ही रह गए।”

दूल्‍हन को साथ लिए लौटी बारात को
दूल्‍हे के घर पर लगाकर,
एक बार पूरे जोश, पूरे जोर-शोर से
बाजों को बजाकर,
आधी रात सोए हुए लोगों को जगाकर
बैंड बिदा हो गया।

अलग-अलग हो चले बजनिए,
मौन-थके बाजों को काँधे पर लादे हुए,
सूनी अँधेरी, अलसाई हुई राहों से।
ताज़ औ’ सिरताज चले साथ-साथ-
दोनों की ढली उमर,
थोड़े-से पके बाल,
थोड़ी-सी झुकी कमर-
दोनों थे एकाकी,
डेरा था एक ही।

दोनों ने रँगे-चुँगी, चमकदार
वर्दी उतारकर खूँटी पर टाँग दी,
मैली-सी तहमत लगा ली,
बीड़ी सुलगा ली,
और चित लेट गए ढीली पड़ी खाटों पर।

लंबी-सी साँस ली सिरताज़ ने-
“हमारी तो कभी शादी न हुई,
न कभी बारात चढ़ी,
न कभी दूल्‍हन आई,
न घर पर बधाई बजी,
हम तो इस जीवन में क्‍वाँरे ही रह गए।
दूसरों की खुशी में खुशियाँ मनाते रहे,
दूसरों की बारात में बस बाजा बजाते रहे!
हम तो इस जीवन में…”

ताज़ सुनता रहा,
फिर ज़रा खाँसकर
बैठ गया खाट पर,
और कहने लगा-
“दुनिया बड़ी ओछी है;
औरों को खुश देख
लोग कुढ़ा करते हैं,
मातम मनाते हैं, मरते हैं।
हमने तो औरों की खुशियों में
खुशियाँ मनाई है।
काहे का पछतावा?
कौन की बुराई है?
कौन की बुराई है?
लोग बड़े बेहाया हैं;
अपनी बारात का बाजा खुद बजाते हैं,
अपना गीत गाते हैं;
शत्रु है कि औरों के बारात का ही
बाजा हम बजा रहे,
दूल्‍हे मियाँ बनने से सदा शरमाते रहे;
मेहनत से कमाते रहे,
मेहनत का खाते रहे;
मालिक ने जो भी किया,
जो
भी दिया,
उसका गुन गाते रहे।”

भिगाए जा, रे…

भीग चुकी अब जब सारी,
जितना चाह भिगाए जा, रे

आँखों में तस्‍वीर कि सारी
सूखी-सूखी साफ़, अदागी,
पड़नी थी दो छींट छटटकर
मैं तेरी छाया से भागी!
बचती तो कड़ हठ, कुंठा की
अभिमानी गठरी बन जाती;
भाग रहा था तन, मन कहता
जाता था, पिछुआए जा, रे!
भीग चुकी अब जब सब सारी,
जितना चाह भिगाए जा, रे!

सब रंगों का मेल कि मेरी
उजली-उजली सारी काली
और नहीं गुन ज्ञात कि जिससे
काली को कर दूँ उजियाली;
डर के घर में लापरवाही,
निर्भयता का मोल बड़ा है;
अब जो तेरे मन को भाए
तू वह रंग चढ़ाए जा, रे!
भीग चुकी अब जब सब सारी,
जितना चाह भिगाए जा, रे!

कठिन कहाँ था गीला करना,
रँग देना इस बसन, बदन को,
मैं तो तब जानूँ रस-रंजित
कर दे जब को मेरे मन को,
तेरी पिचकारी में वह रंग,
वह गुलाल तेरी झोली में,
हो तो तू घर, आँगन, भीतर,
बाहर फाग मचाए जा, रे!
भीग चुकी अब जब सब सारी,
जितना चाह भिगाए जा, रे!

मेरे हाथ नहीं पिचकारी
और न मेरे काँधे झोरी,
और न मुझमें हैबल, साहस,
तेरे साथ करूँ बरजोरी,
क्‍या तेरी गलियों में होली
एक तरफ़ी खेली जाती है?
आकर मेरी आलिंगन में
मेरे रँग रंगाए जा, रे?
भीग चुकी अब जब सब सारी,
जितना चाह भिगाए जा, रे!

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