दो चट्टानें -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

दो चट्टानें -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

क्रुद्ध युवा बनाम क्रुद्ध वृद्ध

“हम सब नपुंसक हैं
बीसवीं सदी की
कमज़ोर, नामर्द औलादें”

सुना
कि अपने देश के
जवान लोग क्रुद्ध हैं-,
सुना
कि देश की जो है
परम्परा, परिस्थिति,
वे उससे
असन्तुष्ट और रुष्ट हैं,
सुना
कि बोलते हैं ऐसी बात
खामखाह जो बुरी लगे,
औ’ करते ऐसे काम
देखकर जिन्हें
अवाम आँख फाड़ दे,
ठिठक रहे ।
किसी जगह,
किसी तरह,
वे दबके चलने के
बहुत खिलाफ हैं;
वे खुलके रहने,
खुलके चलने,
खुलके खेलने के
पैरोकार हैं ।
वे कहते हैं,
पुरानी रस्म-रीतियों के
इम नहीं गुलाम हैं,
जहान में
नई फिज़ाएँ लाने को
विकल हैं,
बेकरार हैं !

क्रुद्ध
युवा क्या होंगे,
हम जो वृद्ध क्रुद्ध हैं ।
परम्परायों को
हममें वे मूर्त न समझें,
अपने यौवन में
हम भी उनसे झगड़े हैं ।
उखड़ गए हम,
खड़ी हुईं ये,
कमबख्तों की
कितनी पाएदार,
और मजबूत जड़ें हैं ।
खून-पसीने से
जो कर न सके हम,
बातों से कर लेंगे;
बरखुरदार बड़े भोले हैं ।
ठोस कदम क्या वे रक्खेंगे,
जो कि खोखले हैं, पोले हैं ।
व्यंग्य सुगम हैं,
चुहल सरल है,
कर लें, देखें, क्या बनता है?
दम जिनमें है नहीं
टोलियों से, उच्छृंखल,
और नपुंसक-दल से कोई रण ठनता है?
तोड़-फोड़ आसान,
सृजन के लिए रक्त देना पड़ता है,
अपनी वृद्ध नसों से हम दें ?
दे सकते हैं ।
और देंगे भी ।
हम अब भी कुछ कर सकने का साहस रखते हैं ।
इम सरोष, त्यक्ताश,
आज कुछ कर गुज़रेंगे ।
हट जाएँ, हम बहुत गरम हैं !

काठ का आदमी

मैंने काठ का आदमी देखा है !
विश्वास नहीं?
काठ के उल्लू पर विश्वास है,
काठ के आदमी पर नहीं !
मैंने काठ का आदमी देखा है!

वह चलता-फिरता है,
हाथ उठाता-गिराता है,
शीश झुकाता है,
मुँह चलाता है,
आँख मटकाता है,
हंसता है, बोलता है, गाता है,
प्रेयसी को गले लगाता है ।

हाड़-मांस के मनुष्य से
फर्क सिर्फ इतना है,
मंज़िल पर पहुंचकर
थकने का सुख नहीं पाता है,
पुलकित नहीं होता है ।

सिर झुके सौ नहीं, हजार बार,
समर्पित नहीं होता है ।

मुँह तो चलाता, पर
बात सदा दूसरे की
दूसरे के स्वर में दुहराता है।
गाता हुआ, गाता नहीं,
दूसरे का टेप किया गीत ही बजाता है।
सम्भोग करता है,
सृजन नहीं करता है,
कर नहीं पाता है !

जो कुछ कहा है मैंने, ठीक है न ?
देखो, हाथ खट से उठाता है !

माँस का फर्नीचर

दिनानुदिन
दिन को रात-सा किए,
वातानुकूलित कमरे में या
बिजली के पंखे के तले,
भारी परदों से घिरा,
कुर्सी-मेज़ के बीच माँस के फर्नीचर-सा
जीवन मुझें नहीं सुहाता-
नौ-बटा-दस मोकप्पड़,
चश्मा नाक पर,
उल्लू-सा चिन्तन-रत,
बिजली की रोशनी में
रीति-बद्ध शब्द पढ़ता,
लीक-बंधी पंक्ति लिखता,
विद्वान-सा दिखता,
कभी-कभी नज़र मार लेता
घड़ी की सुइयों पर
ड्यूटी भर पूरी कर
गाड़ी में लदकर घर जाता ।
मैं चाहता हूं
कि वह खुले में निकले
वजन उठाए, ढोए-,
बोझभरी गाड़ी ठेले,
कड़ी जमीन गोड़े,
मिट्टी के ढोंके फोड़े,
नौ-बटा-दस नग्न
पोर-पोर सूरज की किरन पिए,
नस-नस जिए,
तर-तर पसीना चुए
चोटी से एड़ी तक,
मध्यान्तर जाने वह
सिर पर परछाईं जब
छोटी हो पांव छुए,
औ’ जब वह क्षितिज छुए
छोटी से लम्बी हो,
काम पूर्ण,
नीड़-मुखी पंछी-सा
गाता हुआ घर जाए,
हर-हर नहाए,
मूख कुलबुलाए’
तृप्त-शान्त सो जाए,
पूर्णकाम ।

माँस के फर्नीचर को उसे देख ईर्ष्या हो,
माँस के फर्नीचर को देख, वह तरस खाए ।

भुस की गठरी और हरी घास का आँगन

जी नहीं,
मेरे दिमाग में भूसा नहीं भरा है,
भूसा जड़, अँधेरी, बन्द, बुसी
कोठरियों में भरा रहता है;
मेरा दिमाग खुला है,
उसपर ताजी हवाएँ बहती हैं,
सूरज-चांद की किरणें बिखरती हैं
उसपर बरसात झड़ती है,
घास उगती है,
घास-मरकती-सी हरी,
चिकनी, ठंडी, मर्मस्पर्शी,
आँखों को भानेवाली, जुड़ानेवाली,
तलवों को ही नहीं,
मन को भी गुदगुदानेवाली,
सबका दामन थामकर बिठलानेवाली,
जानदार है, जड़ नहीं, जड़दार है,
पकड़ है, पुकार है, मनुहार है ।
तुम पशु हो तो उसे चरो,
इससे तुम्हारा पेट भरेगा,
बैठो, जुगाली करो ।

प्रेमी हो तो इस प्रकार बिचरो,
लेटो, सुख की इससे अच्छी सेज नहीं बनी
एक ही तरह का अनुभव करते हैं,
क्या गरीब-क्या धनी ।
चिंतित हो तो इसे कुतरो,
चिन्ता कुछ घटेगी,
इसका आश्वासन नहीं देता
कि पूरी तरह कटेगी,
चिन्ताएँ कुछ और कठोर खाकर अघाती हैं ।
थके हो मांदे हो तो आओ,
इस पर बैठकर सुस्ताओ;
तुम ताज़े होकर उठोगे ।
तुम ऐसे कुछ भी नहीं हो,
साधारण हो,
तो भी यह तुम्हारा आंगन है,
हरी घास पर सबके लिए आकर्षण है ।

अच्छा है कि यहां
कली नहीं फूल नहीं,
फलों-भरी डाल नहीं;
दानों लदी बाल नहीं,
धन नहीं, धान्य नहीं ।

यह सब अगर होता
तो बड़ा भार होता,

घर उठाने का बखेड़ा

और लोमश इस तरह सौ वर्ष जीते ।

और लोमश ऋषि रहा करते धरा में खोद गढ्ढा !
एक दिन उनसे किसी ने कहा,
“मुनिवर, घर बना लेते कहीं पर !”
क्वचित अन्यमनस्कता से कहा मुनि ने,
“कौन इतने अल्प जीवन के लिए
घर खड़ा करने का बखेड़ा सिर उठाए !”

मुनि विरागी ही नहीं थे,
थे बड़े व्यवहारकुशल, बड़े हिसाबी;
एक घर यदि सौ बरस तक खड़ा रहता,
झेलता हिम, ग्रीष्म, वर्षा,
ज़रा सोचो तो कि अपने ‘अल्प’ जीवन में
उठाना उन्हें कितनी बार पड़ता
घर उठाने का बखेड़ा ।”

(आपके कौतूहल को शान्त करने के लिए मैं
यह बता देना चाहता हूँ कि लोमश ऋषि को
4,86,60,43,12,50,000 (चार नील, छियासी
खरब, साठ अरब, सैंतालीस करोड़, बारह लाख
पचास हजार) मकान बनाने पड़ते ! आप चाहें
तो हिसाब लगाकर देख सकते हैं । हिसाब
लगाते समय इसे न भूलें कि हर चौथे साल
365 दिन के बजाय 366 दिन का साल होता है ।)

दयनीयता : संघर्ष : ईर्ष्या

निम्नतम स्तर पर पड़ा तू
आज है मोहताज
झंझी कौड़ियों के लिए
जिनका मूल्य तुझको रुपयों से अधिक
पाई दाय में जो दीनता, जो हीनता
वह अखरती हर समय,
पर सविशेष प्रात: और सायंकाल,
जाना है कहीं संकोच,
आना किसी का संताप-लज्जापूर्ण,
सह ले सौ अभाव मनुष्य,
कैसे सहे घर में पड़े प्रियजन रुग्ण,
दूभर पथ्य और इलाज,
कैसे आत्मा अपनी बचाए,
लाज से नीचे गड़े, गड़ता न जाए,
यदि बने, परबस,
अपरिचित और परिचित
जनों की दयनीयता का पात्र ।
करुणा उतरती है,
नहीं ऊपर को उठाती,
और उसपर पला करते आत्मघाती ।

देश-काल-समाज, यदि कुछ भाग्य,
उसकी भी चुनौती
आज तू स्वीकारता है,
शक्तियां सोई जगाता और दृढ़ संकल्प-साहस
बाँध करके मुट्ठियों में
चढ़ रहा है सीढ़ियों पर
जो कि सीधी खड़ी, ऊँची,
और जिनपर डटे पहले से
किसी भी नए के पद को
वहाँ टिकने न देते,
रोकते, बलपूर्वक धक्के लगाते,
और नीचे ठेल और ढकेल देते ।
आज कुछ ऊपर अगर तू आ सका है,
पोर-पोर थकान, नस-नस पीर,
तन का नील औ’ लोहू-पसीना,
काम आए हुए प्रियजन,
साक्षी संघर्ष के
जो तुझे इसके वास्ते करना पड़ा है ।
व्यक्ति संघ-विधान से जब जूझता है
जीतता भी तो, बहुत कुछ टूटता है ।
और ताली जीत पर बस खेल के मैदान में है,
क्षेत्र जीवन का उपेक्षा का,
लगाए धूप का चश्मा दृगों पर, बेहया,
औ’ तेल डाले कान में है ।
आज किसको याद है
संघर्ष की तेरी कहानी ?
आज किसको याद है वह दिन
कि जब तू निम्नतम स्तर पर पड़ा था ?
आज तुझसे जो पड़े नीचे
कि जो नीचे पड़े ही रह गए हैं,
समझते हैं,
नियति ने अपनी कृपा से
गोद में तुझको उठा ऊपर बिठाया-
पक्षपात किया गया है–
और तेरे प्रति अगर कुछ,
ईर्ष्या है, ईर्ष्या ही ईर्ष्या है ।

और मैं संध्या समय बैठा हुआ
यह सोचता, क्या
आज का युग-व्यक्ति जीवन-क्रम
यही दयनीयता, संघर्ष, ईर्ष्या ?
सहन करनी पड़ी थी दयनीयता,
संषर्घ झेला,
सही जाती नहीं ईर्ष्या,
क्योंकि किससे ?
इन अकिंचन, बड़ा मूल्य वसूलकर
उपलब्धियों से !
तो मनुज संकीर्ण कितना, संकुचित है,
हीन, दैन्यग्रस्त है !
अन्तर व्यथित है ।

 दिए की माँग

रक्‍त मेरा माँगते हैं।
कौन?
वे ही दीप जिनको स्‍नेह से मैंने जगाया।

बड़ा अचरज हुया
किन्‍तु विवेक बोला:
आज अचरज की जगह दुनिया नहरं है,
जो असंभव को और संभव को विभाजित कर रही थी
रेख अब वह मिट रही है।
आँख फाड़ों और देखो
नग्‍न-निमर्म सामने जो आज आया।
रक्‍त मेरा माँगते हैं।
कौन?
वे ही दीप जिनको स्‍नेह से मैंने जगाया।

वक्र भौंहें हुईं
किन्‍तु वि‍वेक बोला:
क्रोध ने कोई समस्‍या हल कभी की?
दीप चकताचूर होकर भूमि के ऊपर पड़ा है,
तेल मिट्टी सोख़ती है,
वर्तिका मुँह किए काला,
बोल तेरी आँख को यह चित्र भाया?
रक्‍त मेरा माँगते हैं।
कौन?
वे ही दीप जिनको स्‍नेह से मैंने जगाया।

मन बड़ा ही दुखी,
किन्‍तु विवेक चुप है।
भाग्‍य-चक्र में पड़ा कितना कि मिट्टी से दिया हो,
लाख आँसु के कणों का सत्‍त कण भर स्‍नेह विजेता,
वर्तिका में हृदय तंतु बटे गए थे,
प्राण ही जलता रहा है।
हाय, पावस की निशा में, दीप, तुमने क्‍या सुनाया?
रक्‍त मेरा माँगते हैं।
कौन?
वे ही दीप जिनको स्‍नेह से मैंने जगाया।

स्‍नेह सब कुछ दान,
मैंने क्‍या बचाया?
एक अंतर्दाह, चाहूँ तो कभी गल-पिघल पाऊँ।
क्‍या बदा था, अंत में मैं रक्‍त के आँसू बहाऊँ?
माँग पूरी कर चुका हूँ,
रिक्‍त दीपक भर चुका हूँ,
है मुझे संतोष मैंने आज यह ऋण भी चुकाया।
रक्‍त मेरा माँगते हैं।
कौन?
वे ही दीप जिनको स्‍नेह से मैंने जगाया।

शिवपूजन सहाय के देहावसान पर

मृत्यु यहाँ जन्म दिया करती है ।
भस्म हुई काया थी,
यश-काया जलती है न मरती है,
काल-जई युग-युग निखरती है ।

वाङ्मय स्वरूप धार
खड़ा हुआ ज्यों पहाड़;
पीठ पर बहुत बड़ा साया है;
आयो नव जोधाओ,
सन्मुख बाधाओं, विरोधों का
निर्भय करो निदान,
हिन्दी की शक्ति और क्षमता का
देना तुम्हें प्रमाण !

ड्राइंग रूम में मरता हुआ गुलाब

(गजानन माधव मुक्तिबोध की स्मृति में)

गुलाब
तू बदरंग हो गया है
बदरूप हो गया है
झुक गया है
तेरा मुंह चुचुक गया है
तू चुक गया है ।

ऐसा तुझे देख कर
मेरा मन डरता है
फूल इतना डरावाना हो कर मरता है!

खुशनुमा गुलदस्ते में
सजे हुए कमरे में
तू जब

ऋतु-राज राजदूत बन आया था
कितना मन भाया था-
रंग-रूप, रस-गंध टटका
क्षण भर को
पंखुरी की परतो में
जैसे हो अमरत्व अटका!
कृत्रिमता देती है कितना बडा झटका!

तू आसमान के नीचे सोता
तो ओस से मुंह धोता
हवा के झोंके से झरता
पंखुरी पंखुरी बिखरता
धरती पर संवरता
प्रकृति में भी है सुंदरता

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