दो चट्टानें -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 2

दो चट्टानें -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 2

खून के छापे

(एक स्वप्न : एक समीक्षा)

सुबह-सुबह उठकर क्‍या देखता हूँ
कि मेरे द्वार पर
खून-रँगे हाथों से कई छापे लगे हैं।

और मेरी पत्‍नी ने स्‍वप्‍न देखा है
कि एक नर-कंकाल आधी रात को
एक हाथ में खून की बाल्‍टी लिए आता है
और दूसरा हाथ उसमें डुबोकर
हमारे द्वार पर एक छापा लगाकर चला जाता है;
फिर एक दूसरा आता है,
फिर दूसरा, आता है,
फिर दूसरा, फिर दूसरा, फिर दूसरा… फिर…

यह बेगुनाह खून किनका है?
क्‍या उनका?
जो सदियों से सताए गए,
जगह-जगह से भगाए गए,
दुख सहने के इतने आदी हो गए
कि विद्रोह के सारे भाव ही खो गए,
और जब मौत के मुँह में जाने का हुक्‍म हुआ,
निर्विरोध, चुपचाप चले गए
और उसकी विषैली साँसों में घुटकर
सदा के लिए सो गए
उनके रक्‍त की छाप अगर लगनी थी तो
-के द्वार पर।

यह बेज़बान ख़ून किनका है?
जिन्‍होंने आत्‍माहन् शासन के शिकंजे की
पकड़ से, जकड़ से छूटकर
उठने का, उभरने का प्रयत्‍न किया था
और उन्‍हें दबाकर, दलकर, कुचलकर
पीस डाला गया है।
उनके रक्‍त की छाप अगर लगनी थी तो
-के द्वार पर।

यह जवान खून किनका है?
क्‍या उनका?
जो अपने माटी का गीत गाते,
अपनी आजादी का नारा लगाते,
हाथ उठाते, पाँव बढ़ाते आए थे
पर अब ऐसी चट्टान से टकराकर
अपना सिर फोड़ रहे हैं
जो न टलती है, न हिलती है, न पिघलती है।
उनके रक्‍त की छाप अगर लगनी थी तो
-के द्वार पर।
यह मासुम खून किनका है?
जो अपने श्रम से धूप में, ताप में
धूलि में, धुएँ में सनकर, काले होकर
अपने सफेद-स्‍वामियों के लिए
साफ़ घर, साफ़ नगर, स्‍वच्‍छ पथ
उठाते रहे, बनाते रहे,
पर उनपर पाँव रखने, उनमें पैठने का
मूल्‍य अपने प्राणों से चुकाते रहे।
उनके रक्‍त के छाप अगर लगनी थी तो
-के द्वार पर।

यह बेपनाह खून किनका है?
क्‍या उनका?
जो तवारीख की एक रेख से
अपने ही वतन में एक जलावतन हैं,
क्‍या उनका?
जो बहुमत के आवेश पर
सनक पर, पागलपन पर
अपराधी, दंड्य और वध्‍य
करार दिए जाते हैं,
निर्वास, निर्धन, निर्वसन,
निर्मम क़त्‍ल किए जाते हैं,
उनके रक्‍त की छाप अगर लगनी थी तो
-के द्वार पर।

यह बेमालूम खून किनका है?
क्‍या उन सपनों का?
जो एक उगते हुए राष्‍ट्र की
पलको पर झूले थे, पुतलियों में पले थे,
पर लोभ ने, स्‍वार्थ ने, महत्‍त्‍वाकांक्षा ने
जिनकी आँखें फोड़ दी हैं,
जिनकी गर्दनें मरोड़ दी हैं।
उनके रक्‍त की छाप अगर लगनी थी तो
-के द्वार पर।
लेकिल इस अमानवीय अत्‍याचार, अन्‍याय
अनुचित, अकरणीय, अकरुण का
दायित्‍व किसने लिया?
जिके भी द्वार पर यह छापे लगे उसने,
पानी से घुला दिया,
चूने से पुता दिया।

किन्‍तु कवि-द्वार पर
छापे ये लगे रहें,
जो अनीति, अत्ति की
कथा कहें, व्‍यथा कहें,
और शब्‍द-यज्ञ में मनुष्‍य के कलुष दहें।
और मेरी पत्‍नी ने स्‍वप्‍न देखा है
कि नर-कंकाल
कवि-कवि के द्वार पर
ऐसे ही छापे लगा रहे हैं,
ऐसे ही शब्‍द-ज्‍वाला जगा रहे हैं।

भोलेपन की कीमत

(लुमुम्बा की स्मृति में)

तुम इसे कलप्ना कहो, स्वप्न की बात कहो,
क्या फ़र्क पड़ा;
शुद्ध सत्य किसकी आंखों ने देखा है ?
जिन आंखों ने परियाँ देखीं, सुन्दरियां देखीं,
सूनी घड़ियाँ भी देखीं,
उनसे हीं मैंने देखा है-

पर्वतमाला में आग लगी, जलती है,
अंबर छूने को लपटें उठतीं,
निर्झर झुलसा, तपकर चट्टान चटकती है,
जानवर नहीं रोते चिल्लाते, घबराते ।
वे सहज बोध से आने वाली दुर्घटना को
जान त्राण की कोई राह बना लेते ।

वन जलता है,
लकड़ी तो अपने अन्दर आग बसाए है,
ज्वाला-माला का जैसे रेला-मेला है ।
पंछी क्यों रोएँ, चिल्लाएँ या घबराएँ ?-
सारा नभमण्डल उनका है, पर उनके हैं ।
घर जलता, बस्ती जलती है;
इन्सान छोड़कर सब कुछ भागे जाते हैं;
प्राणों से बढ़कर और बचा लेने की कोई चीज़ नहीं;
कुछ ध्वंस न ऐसा हो सकता, यदि जीता है,
इन्सान पुनर्निर्माण न जिसका कर लेता !

बच्ची का घर के पास घरौंदा जलता है–
गुड़िया गुड्डे के साथ पलंग पर बैठी है-
‘अब उनको कौन चेताएगा !-
अब उनको कौन बचाएगा!’
बच्ची चिल्लाती लपटों में धँस जाती है,
अपने भोले मन, भोले बचपन की कीमत
प्राणों के साथ चुकाती है ।

गाँधी

एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,

जिस समय हिंसा,
कुटिल विज्ञान बल से हो समंवित,
धर्म, संस्‍कृति, सभ्‍यता पर डाल पर्दा,
विश्‍व के संहार का षड्यंत्र रचने में लगी थी,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था!

एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,
जिस समय अन्‍याय ने पशु-बल सुरा पी-
उग्र, उद्धत, दंभ-उन्‍मद-
एक निर्बल, निरपराध, निरीह को
था कुचल डाला
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था?

एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,
जिस समय अधिकार, शोषण, स्‍वार्थ
हो निर्लज्‍ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्‍द्व
सद्य: जगे, संभले राष्‍ट्र में घुन-से लगे
जर्जर उसे करते रहे थे,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था?

क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
यदि मिलती न हिंसा को चुनौ‍ती,
क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
यदि अन्‍याय की ही जीत होती,
क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
जाति स्‍वतंत्र होकर
यदि न अपने पाप धोती!

युग-पंक : युग-ताप

दूध-सी कर्पूर-चंदन चाँदनी में
भी नहाकर, भीगकर
मैं नहीं निर्मल, नहीं शीतल
हो सकूँगा,
क्‍यों कि मेरा तन-बसन
युग-पंक में लिथड़ा-सना है
और मेरी आत्‍मा युग-ताप से झुलसती हुई है;
नहीं मेरी ही तुम्‍हारी, औ’ तुम्‍हारी और सबकी।
वस्‍त्र सबके दाग़-धब्‍बे से भरे हैं,
देह सबकी कीच-काँदों में लिसी, लिपटी, लपेटी।

कहाँ हैं वे संत
जिनके दिव्‍य दृग
सप्‍तावरण को भेद आए देख-
करूणासिंधु के नव नील नीरज लोचनों से
ज्‍योति निर्झर बह रहा है,
बैठकर दिक्‍काल
दृढ़ विश्‍वास की अविचल शिला पर
स्‍नान करते जा रहे हैं
और उनका कलुष-कल्‍मष
पाप-ताप-‘ भिशाप घुलता जा रहा है।

कहाँ हैं वे कवि
मदिर-दृग, मधुर-कंठी
और उनकी कल्‍पना-संजात
प्रेयसियाँ, पिटारी जादुओं की,
हास में जिनके नहाती है जुन्‍हाई,
जो कि अपनी बहुओं से घेर
बाड़व के हृदय का ताप हरतीं,
और अपने चमत्‍कारी आँचलों से
पोंछ जीवन-कालिमा को
लालिमा में बदलतीं,
छलतीं समय को।
आज उनकी मुझे, तुमको,
और सबको है जरुरत।
कहाँहैं वे संत?
वे कवि हैं कहाँ पर?-
नहीं उत्‍तर।

वायवी सब कल्‍पनाएँ-भावनाएँ
आज युग के सत्‍य से ले टक्‍करें
गायब हुई हैं।
कुछ नहीं उपयोग उनका।
था कभी? संदेह मुझको।
किन्‍तु आत्‍म-प्रवंचना जो कभी संभव थी
नहीं अब रह गई है।
तो फँसा युग-पंक में मानव रहेगा?
तो जला युग-ताप से मानव करेगा?
नहीं।
लेकिन, स्‍नान करना उसे होगा
आँसुओं से- पर नहीं असमर्थ, निर्बल और कायर,
सबल पश्‍चा के उन आँसुओं से,
जो कलंको का विगत इतिहास धोते।
स्‍वेद से- पर नहीं दासों के, खरीदे और बेचे,-
खुद बहाए, मृत्तिका जिसे कि अपना ऋण चुकाए।
रक्‍त से- पर नहीं अपने या पराए,
उसी पावन रक्‍त से
जिनको कि ईसा और गाँधी की
हथेली और छाती ने बहाए।

बाढ़-पीड़ितों के शिविर में

यहाँ अजीब-अजीब नेता आते हैं,
चक्कर लगाते हैं,
तरह-तरह के नारे लगवाते हैं,
उनका मतलब हम नहीं समझ पाते हैं ।
कहते हैं कानून भंग करो,
यानी सरकार को तंग को,
सरकार है तो बाढ़ रोके,
यह नहीं कर सकती
तो गद्दी से हटे, भाड़ झोंके!

और हम जो बाढ़ के शिकार हैं,
समझने में लाचार हैं
कि सरकार अगर भाड़ भी झोंकेगी
तो बाढ़ कैसे रोकेगी!
बाढ़ तो पहले भी आती थी,
अब भी आती है,
हम भी इसके आदी हैं;
अगले सालों की तरह अबके भी आ गई है,
मुसीबत है, पर क्या नई है?…
जैसे पहले झेली थी, अब भी झेलेंगे
किस्मत हमसे खेल करती है,
हम भी किस्मत से खेलेंगे ।
बरसात है, बरखा है, लगातार मूसलाधार-
डबहे से तलैया, तलैया से ताल, ताल से तालाब
तालाब से झील, झील मीलों-मील;
उधर से नदी भरी है, नहीं, उठी है, उमगी है, उफनाई है,
अपनी बहन झील से गले मिलने आई है ।
बीच में डूब गए हैं हमारे खेत-खलिहान,
फूस-छाए मकान,
खेतिहर के छोटे-मोटे सामान ।
घरों में क्या है जो हम हटाएँ,
न हटा पाने पर कोहराम मचाएँ,
न किताबें, न कुर्सियां, न कालीनें, न आलमाराएँ ।
हमारे पुरखों ने सिखलाया
कि जब-जब बाढ़ आए,
दो चीज़ बचाना–
छाती में विश्वास
और हाँडी में दाना ।
वही लिए हम यहाँ आए हैं,
उसी के सहारे हम यहाँ बैठे हैं,
उसी बीज और विश्वास के भरोसे-
जब पानी उतरेगा, घटेगा, हटेगा,
और ज़मीन उबरेगी,
तरोताज़ा होकर उभरेगी,
जैसे ग्रहण छूट जाने पर चांद-
हम वापस जाएँगे;
नए, उर्वर खेतों में;
चना-मटर बोएंगे, सरसों
धरती हरियाएगी, पियराएगी,
हम फसल काटकर घर लाएँगे,
होली जलाएंगे,
गाएँगे फाग,
पानी-परेशानी पर
आग-राग की जय मनाएँगे
(थोडी देर के लिए भूल जाएँगे
कि पानी-हलाकानी के दिन फिर आएँगे । )

युग और युग

उस नक्कारे की यकायक डमकार
कि घटाटोप तम का परदा
चर्र से फटकर अलग हो गया ।
प्रकाश आकाश से फूटकर-
जैसे किसी की बाँध को तोड़कर जल-धार-
आर-पार फैल गया ।
सूरज घर-घर घूमने लगा,
किरणों के तार द्वार-द्वार बिछ गए ।

दूर ऊँचे पर्वतों से
निर्झर नीचे को चले-दौड़े,
पेड़ों पर चिड़ियों के पर-स्वर खुले,
मैदानों में नदियां उठीं, कगारे गिरे,
पाट हो गए चौड़े ।

जो पशु वन कर सोए थे
नर बनकर जगे,
देव बनकर खड़े हुए,
देवता बनकर चले;
कितने छोटे कितने बड़े हुए,
कितने खोटे, कितने भले !

उस नक्कारे पर मढ़ने को
किस नाहर ने अपनी खाल दी थी-
जैसे दधीचि ने अपनी हड्डी-
कि उस पर एक चोट
कि एक युग का विस्फोट !

धुआँ है, धुंध है, अँधेरा है,
मंजिल भी ओझल हो गई है,
रास्ता भी लापता है,

कोई नहीं कहता, कौन शाह, कौन लुटेरा है,
सब कहते हैं, लूट है, चोरी है, हेरा-फेरी है ।

झरनों का संगीत मन्द है,
विहंगम नीड़ों में बन्द हैं,
उनके पर झड़ रहे हैं,
नदियां सूख रही हैं,
कछारों में दरारे पड़ रहे हैं ।

विकास के क्रम में विपर्यय है,
बड़ा बौना हो रहा है,
बौना बितौना,
अंधेरे की नीति है-
उजले को पकड़े जाने का डर है,
काला निर्भय है ।
कुछ चमगादडों के चाम को
जोड़-जाड़कर
एक दमामे पर चढ़ाने का
प्रयास हो रहा है,
किसको नवयुग-उद्घोष का
विश्वास हो रहा है?

लेखनी का इशारा

ना ऽ ऽ ऽ ग!
-मैंने रागिनी तुझको सुनाई बहुत,
अनका तू न सनका-
कान तेरे नहीं होते,
किन्‍तु अपना कान केवल गान के ही लिए
मैंने कब सुनाया,
तीन-चौथाई हृदय के लिए होता।
इसलिए कही तो तुझेमैंने कुरेदा और छेड़ा
भी कि तुझमें जान होगी अगर
तो तू फनफनाकर उठ खड़ाा होगा,
गरल-फुफकार छोड़ेगा,
चुनौती करेगा स्‍वीकार मेरी,
किन्‍तु उलझी रज्‍जु की तू एक ढेरी।

इसी बल पर,
धा ऽ ऽ ऽ ध,
कुंडल मारकर तू
उस खजाने पर तू डटा बैठा हुआ है
जो हमारे पूर्वजों के
त्‍याग, तप बलिदान,
श्रम की स्‍वेद की गाढ़ी कमाई?
हमें सौपी गई थी यह निधि
कि भोगे त्‍याग से हम उसे,
जिससे हो सके दिन-दिन सवाई;
किन्‍तु किसका भोग,
किसका त्‍याग,
किसकी वृद्धि‍।
पाई हुई भी है
आज अपनाई-गँवाई।

दूर भग,
भय कट चुका,
भ्रम हट चुका-
अनुनय-विनय से
रीझनेवाला हृदय तुझमें नहीं है-
खोल कुंडल,
भेद तेरा खुल चुका है,
गरल-बल तुझमें नहीं अब,
क्‍यों कि उससे विषमतर विषपर
बहुत दिन तू पला है,
चाटता चाँदी रहा है,
सूँघता सोना रहा है।
लट्ठबाजों की कमी
कुछ नहीं मेरे भाइयों में,
पर मरे को मार करके-
लिया ही जिसने, दिया कुछ नहीं,
यदि वह जिया तो कौन मुर्दा?
कौन शाह मदार अपने को कहाए!
क़लम से ही
मार सकता हूँ तुझे मैं;
क़लम का मारा हुया
बचता नहीं है।
कान तेरे नहीं,
सुनता नहीं मेरी बात
आँखें खोलकर के देख
मेरी लेखनी का तो इशारा-
उगा-डूबा है इसी पर
कहीं तुझसे बड़ों,
तुझसे जड़ों का
कि़स्‍मत-सितारा!

कुकडूँ-कूँ

इनमें से कोई कहता है,
मैं युगान्तकारी हूँ!
कोई पुकारता है,
मैं युगान्तकारी हूँ!
कोई चीखता है,
मैं युगप्रवर्तक हूँ।
कोई चिल्लाता है,
मैं नव जागरण का दूत हूँ।
कोई आवाज़ लगाता है,
मैं नव प्रभात का सूर्य हूँ।
कोई घोषणा करता है,
मैं नव युग का तूर्य हूँ ।
और मैं अपनी निद्रा-प्रेयसी के
अर्द्ध शिथिल बाहुपाश से
धीरे से अपने को मुक्त करता हूँ,
चारपाई से धरती पर पाँव धरता हूँ,
अस्फुट स्वर में कहता हूँ,
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले ।
विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यँ पादस्पर्श क्षमस्व मे ।।
फिर आसमान की तरफ आँख उठाता हूँ,
कुछ ऐसा संकेत पाता हूँ,
सारे जीवन से एक हो जाता हूँ,
हवा के साथ बहता हूँ,
सुगन्ध के साथ बहकता हूँ,
चिड़ियों के साथ चहकता हूँ,
सूरज के साथ उठता हूँ,
किरनों के साथ उतरता हूँ,
सब पर बिखरता हूँ,
सबको जगाता-उठाता हूँ,
वचन पर मौन की,
मौन पर कर्म की जय मनाता हूँ।
नव युग,
नव प्रभात, नव जागरण
मैं लाता नहीं स्वयं हूँ
और ये हैं
नव युग,
नव जागरण,
नव प्रभात के मुर्गे ।
इन्सानों की दुनिया में
कुकडूँ-कूँ….कुक
कई तरह से की जा सकती है;
शायद मैंने भी की हो,
गो कविता लिख दी हो ।
मूल बात यह है
कि सवेरा होने पर मुर्गे बोलते हैं,
मुर्गे के बोलने से सवेरा नहीं होता ।

सुबह की बाँग

मुर्गा इतना मूर्ख, भोला, आत्मदंभी नहीं
इतना भी न समझे,
प्रात होता है सदा अपने समय से,
सूर्य उठता क्षितिज पर
अगणित किरण के शर चलाता,
तिमिर हो भयभीत-आहत
भागता चुपचाप,
जीवन-ज्योति-जागृती-गान
कण-कण गूँजता है ।

किन्तु उसके शीश पर जो
अरुणिमा का ताज रक्खा गया
उसकी लाज,
उसकी आन भी उसको निभानी;
और उसके वक्ष में जो आग,
उसके कंठ में जो राग,
स्वर जो तीव्र, तार, सुतीक्ष्ण
रक्खा गया उसका
निष्कलुष दायित्व भी उसको उठाना ।
रात-दिन क्रम में
निशा की कालिमा अनिवार्य
यह वह जानता है,
भैरवी की भूमिका के मौन की पदचाप वह पहचानता है,
किन्तु आशा-आस्था करती प्रतीक्षा,
थकी, अलसाई हुई,
अन्तिम प्रहर की
नर्म, जैसे मर्म सहलाती हवा में सो न जाएँ,
अचकचा चेतन्त होता,
वायवी सपने पलक से झाड़ता है,
फेफड़ों का जोर, फिर, पूरा लगाता
वक्त को ललकारता-
ललकारता-
ललकारता है ।

गत्यवरोध

बीतती जब रात,
करवट पवन लेता
गगन की सब तारिकाएँ
मोड़ लेती बाग,
उदयोन्‍मुखी रवि की
बाल-किरणें दौड़
ज्‍योतिर्मान करतीं
क्षितिज पर पूरब दिशा का द्वार,
मुर्ग़ मुंडेर पर चढ़
तिमिर को ललकारता,
पर वह न मुड़कर देखता,
धर पाँव सिर पर भागता,
फटकार कर पर
जाग दल के दल विहग
कल्‍लोल से भूगोल और खगोल भरते,
जागकर सपने निशा के
चाहते होना दिवा-साकार,
युग-श्रृंगार।

कैसा यह सवेरा!
खींच-सी ली गई बरबस
रात की ही सौर जैसे और आगे-
कुढ़न-कुंठा-सा कुहासा,
पवन का दम घुट रहा-सा,
धुंध का चौफेर घेरा,
सूर्य पर चढ़कर किसी ने
दाब-जैसा उसे नीचे को दिया है,
दिये-जैसा धुएँ से वह घिर,
गहरे कुएँ में है दिपदिपाता,
स्‍वयं अपनी साँस खाता।

इस अनिष्टकारी तिमिर से जूझना तो दूर-
एक घुग्‍घू,
पच्छिमी छाया-छपे बन के
गिरे; बिखरे परों को खोंस
बैठा है बकुल की डाल पर,
गोले दृगों पर धूप का चश्‍मा लगाकर-
प्रात का अस्तित्‍व अस्‍वीकार रने के लिए
पूरी तरह तैयार होकर।

और, घुघुआना शुरू उसने किया है-
गुरू उसका वेणुवादक वही
जिसकी जादुई धुन पर नगर कै
सभी चूहे निकल आए थे बिलों से-
गुरू गुड़ था किन्‍तु चेला शकर निकाला-
साँप अपनी बाँबियों को छोड़
बाहर आ गए हैं,
भूख से मानो बहुत दिन के सताए,
और जल्‍दी में, अँधेरे में, उन्‍होंने
रात में फिरती छछूँदर के दलों को
धर दबाया है-
निगलकर हड़बड़ी में कुछ
परम गति प्राप्‍त करने जा रहे हैं,
औ’ जिन्‍होंने अचकचाकर,
भूल अपनी भाँप मुँह फैला दिया था,
वे नयन की जोत खोकर,
पेट धरती में रगड़ते,
राह अपनी बाँबियों की ढूँढते हैं,
किन्‍तु ज्‍यादातर छछूँदर छटपटाती-अधमरी
मुँह में दबाए हुए
किंकर्तव्‍यविमूढ़ बने पड़े हैं;
और घुग्‍घू को नहीं मालूम
वह अपने शिकारी या शिकारों को
समय के अंध गत्‍यवरोध से कैसे निकाले,
किस तरह उनको बचा ले।

 गैंडे की गवेषणा

मैं अपने गुण की उद्घोषणा करता हूं।
‘गुन प्रगटै अवगुनहिं दुरावै ।’
अहं मेरा सहज स्वधर्म है ।
मैं स्वधर्म की उद्घोषणा करता हूँ ।
‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:’
पर जो स्वधर्म छोड़ता ही नहीं,
उसको निधन तोड़ता ही नहीं ।
अहं अजर, अमर है,
अगर वही अपने को न मारे।
पर वह अपने मरने का सामान पैदा कस्ता है,
यानी सन्तान पैदा करता है,
सन्तान से अधिक कोई अहं को नहीं तोड़ता ।

मेरा बाप मूर्ख था
जो उसने मुझे पैदा किया,
इसी से वह मर गया ।
मैं सन्तान नहीं पैदा करूंगा
पर यह नहीं कि नारी नहीं करूंगा,
अनुत्पादक कहलाऊँगा,
नपुंसक नहीं कहलाऊँगा ।
एक नारी करूंगा,
दो नारी करूंगा,
तीन नारी करूंगा,
ऊपर भी जाऊँगा ।
नारी के समर्पण से अधिक
कोई अहं को नहीं बढ़ाता ।
स्थाई दुनिया में कुछ भी नहीं,
जो बढ़ेगा नहीं वह घटेगा,
जो घटेगा वह मिटेगा,
मैं न-मिटने के लिए
कुछ भी करने में न हिचकूंगा ।

जीना ही तो पहला धर्म है,
यानी अस्तित्व बनाये रहना ।
दुनिया जैसी बनी है
उसमें कुछ मिटकर ही कुछ बनता है।
किसी का अस्तित्व मिटेगा,
तभी किसी का बनेगा ।
और किसका अस्तित्व
सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है ?-
मुझे दुबारा सोचना नहीं है,
अपना ! अपना !! अपना !!!
अपना अस्तित्व बनाये रखने को
सबका अस्तित्व मिटाना भी पड़े
तो भी नहीं झिझकूँगा ।
लेकिन मिटा भी सकूं
तो मैं उन्हें मिटाऊँगा नहीं,
उन्हे कम करके, घटा करके,
नीचा दिखा करके छोड़ दूँगा ;
तुलना में अपने को उनसे अधिक,
उनमे बढ़कर, उनसे ऊँचा
सिद्ध कर ही तो मैं अपने अहं को
पोषित करता रह सकता हूँ।

मिटाने-मिटाने में
लोग मिट भी जाते हैं,
पर मैं ? – मैं ? मिटने को बना हूँ ?-
देखते नहीं मेरा
महाभारी, महा भरकम शरीर,
जैसे हो अहं का सुदृढ़, सुमढ़, सुगढ़,
गढ़ के चारों ओर चौड़े-पक्के पुश्ते,
घन, ठोस, दुर्भेद्य प्राचीर !
भी चरने-चोंथने के लिए है
जंगल की सारी घास,
पीने को है झील-भर पानी,
या करने को जल-क्रीड़ा, जल-विलास !
चलता है वतास
कि मैं ले सकूं स्वच्छन्द सांस,
मेरी नाक की सींग पर
टिका है आकाश का आकाश,
दायित्व कितना बड़ा है मेरे ऊपर !
चन्द्र-दर्शन के समय
मैं छिप जाता हूँ सिकुड़कर
कि मेरे सींग की खाकर टक्कर
कहीं गिर न पड़े वह भू पर !

इतना कुछ कहा है
तो खोल हूँ अब पूरा ही भेद,
मैं हूं कर्ण का अवतार
सबूत में, देखते नहीं
आया हूँ शरीर पर कवच धार ।
दानी के तीन गुण-
दे, न दे, दे कर ले ले ।
कवच ले लिया,
कुण्डल रहने दिया ।
‘अर्ध तजहिं बुध सर्वस जाता ।’
कुण्डल काम भी क्या आता ।
यहाँ सबको है आज़ादी
करें ख़यालों का इज़हार,
होती हैं सभाएँ,
निकलते हैं जलूस,
चिपकाए जाते हैं इश्तहार,
छापे जाते हैं अख़बार,
यानी हर तरफ से होता है वार ।
अगर लेकर न आता इतनी मोटी खाल,
जीना होता बहुत दुश्वार ।
दुनिया में हैं
बहुत-से मत, मतान्तर,
बहुत-से आद-वाद,
पर सबसे ज्यादा काम का है गैंडावाद,
(यानी बेहयावाद)
जिसकी अनुयाई हैं सब सरकारें,
सब संस्थाएँ सब स्कूल, सब उस्ताद,
कोई करता रहे कितनी ही आलोचना, प्रालोचना,
परालोचना, प्रत्यालोचना, समालोचना, कितने ही वार,
तुम चले जायो अपनी ही चाल,
करे जायो अपनी ही बात,
किए जायो अपना ही गुण-गान;
‘रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान ।’

श्रृगालासन

शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीच: क्रष्टाभिमर्दति
-महाभारत, आदि पर्व, 212-8

शेरों के आसन पर
बैठा है आज स्यार
– (निराला के प्रति क्षमायाचना सहित)

बहुत ऊंची
एक मीनारी जगह पर-
सब जगह से दृष्टिगोचर-
आप आसन मानकर
बैठे हुए हैं,
कभी दाएँ
कभी बाएँ सिर घुमाते,
कभी ऊपर सिर उठाते,
कभी नीचे सिर झुकाते,
प्रदर्शन की नम्रता से,
और कद कुछ और ऊँचा लगे,
इससे बीच-बीच उचक रहे हैं;
गति नजर को
खींचती है,
और जितनी दृष्टियां
जितनी दफा पड़ सकें तन पर
आपका मन गुदगुदातीं ।
तुष्ट लोकेषणा
है वरदान कितना बड़ा
जिसके बल
न जाने और कितनी
सिद्धियां उपलब्ध होतीं
फी ज़माना !

आप इतने से
नहीं सन्तुष्ट लेकिन-,
एक साधन और
आकर्षण अगर वह बन सके
तो हर्ज क्या है ।
आप अपनी कान-फाड़
‘हुआ-हुआ’ से भी
दिशायों को ध्वनित, प्र’ ध्वनित करते ।
लोग पूछें,
‘क्या हुए हैं? क्या हुए हैं?’

और दुनिया
जिस तरह अपनी बनी है
वहाँ नीचे पड़े लोगों की
कमी कोई नहीं है ।
किसी भी ऊँची जगह पर
जहाँ कोई नजर आता,
हीन-ग्रन्थि-विवश,
उसे सत्कार देने
या कुतूहल ज्ञात करने को
हजारों टूट पड़ते ।
होइए खुश
गर्दनें दुख रहीं उनकी
और उनकी टोपियां-पगड़ियाँ गिरतीं ।
जिस तरह जयकार सुनने का
किन्हीं को रोग होता,
मर्ज़ होता किन्ही को
जय बोलने का ।
हर ‘हुआ’ पर
‘वाह’ की आवाज़ आती,
और फिर अख़बार का कालम सजाती
औ’ सुयश-दर-सुयश
बढ़ता रोज़ जाता,
फैलता बाहर
न घर में जब समाता ।

बहुत ऊँची और मीनारी जगह पर-
सब जगह से दृष्टिगोचर-
तू जहाँ बैठा हुआ है
वह सिंहासन;
शेर को अधिकार
उस पर बैठने का
जो तमककर तके उसको,
ढुके,
अपने सख्त और सशक्त पंजों के सहारे
एक तीर-छलांग मारे,
और सबके देखते ही देखते
उस पर सुनिश्चित बैठ जाए,
शान से, गम्भीरता से,
हैं अशोकस्तम्भ पर ज्यों सिंह बैठे ।
और क्या बैठे !
हटाने की न हो हिम्मत समय को

और तू मत्था टिका
किन ड्योढ़ियों पर,
नाक अपनी रगड़कर
किन सीढ़ियों पर,
किन खुशामद औ’ बरामद
के रज़ील बरामदों में
खीस अपनी काढ़ता,
किन चुग़लखोरी, चापलूसी के
कमीने आंगनों में,
मुँह चलाता, दुम हिलाता,
नापता दब्बू पगों से
कौन गलियारे अंधेरे
और बदबूदार, सीलन-भरे, सँकरे,
आँख दुनिया की बचाता,
इस जगह तक आ सका है,
बना चौकन्ना कि तेरे,
पांव की आहट किसी को मिल न पाए
तब तलक जब तलक आसन पर न हो जाता सुरक्षित !

स्वाभिमानी सिंह से
यह कभी हो सकता नहीं है,
‘फर्रुखाबादी’
खड़ा औ’ खुला
उसका खेल होता,
किन्तु दुनिया तो नतीजा देखती है ।
सिंह का बल
स्यार के छल से पराजित,
मूल्य का विघटन यही है!

(फर्रुखाबादी=हमारे इलाहाबाद की तरफ एक
कहावत कही जाती है; ‘खड़ा खेल फ़र्रुखाबादी’ ।
अर्थ है, ऐसा काम जिसमें कोई दुराव-छिपाव न हो,
जो खुले-खज़ाना किया जा सके । इस कहावत
का मूल-स्रोत क्या है, मुझे नहीं मालूम ।)

कवि से, केंचुआ

छिपकलियों, बीछीयों, केंचुओं, बर्रों में रम,
जीवन की कल्पना सिसकती”
-पन्त (वाणी)

ओ समानधर्मा !-
मेरे इस संबोधन से
चौंक, ठिठक मत ।
समय आ गया है
यथार्थ को
खुली आँख देखने,
पूर्ण भोगने,
निडर स्वीकृत करने का,
सपने को पाषाणों के अन्दर सेने का ।
उन्नत पर्वत जहाँ कभी थे
वहां टेकरी, टीले, ढीहे,
नद-नदियों की सन्तानें
नाले-नली हैं,
जल-प्रपात का नाती है
नलके का पानी !
यानी,
अब यह नहीं किसी से छिपा हुआ
युग लघु लोगों का-
काश, इसे आकार-प्रकारों तक
सीमित रक्खा जा सकता–
नहीं, साथ ही, यह युग
लघुता का, छोटेपन, ओछेपन का,
जिसका सबसे हीन रूप यह-
बड़े बड़ा कर औरों को
खुद बड़े हुए थे ।
छोटे औरों को अपने से छोटा रखने में
छोटे से छोटे,
छोटे-से-छोटे होते जाते हैं ।
अविरत क्रम है,
किसको गम है?
पूर्वज तेरे
आसमान में सिर ऊँचा रखकर चलते थे,
इन्द्रधनुष की पगड़ी बाँधे;
सूरज, चाँद, सितारे उनसे
आँख मिलाते शरमाते थे ।
जब गाते थे
दिग्-दिगन्त उसकी कड़ियों को दुहराते थे,
मरु से थी रसधार निकलती,
अंधकार में सपनों के दीपक जलते थे?
बोल, तुझे इस महानगर में कौन जानता ?
तेरी भी कोई हस्ती है, कौन मानता ?
सीढ़ी-दर-सीढ़ी पद-क्रम की लगी हुई जो
उस पर तेरा स्थान कहां है?
तुझे निम्नतम से भी धक्के देनेवाले ।
किसको फुरसत है तेरी वाणी सुनने की ?
जीवन-यापन के उपकरण जुटा सकने में-
और उसी के लिए यहां सब जद्दोजहद है-
तेरे शब्द मदद क्या देंगे?

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