दोहे -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

दोहे -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

अहंकार को छोड़ कर, ख़ूब झुका आकाश।
धरती के मन में दिखी, जब मिलने की प्यास।। 51

कलियों के घूंघट उठे, भ्रमर उड़े उस ओर।
मिलने की उम्मीद फिर, ले कर आयी भोर।। 52

गोरी गोरे रूप पर, इतरायी सौ बार।
जब प्रियतम की बॉंह के, पडे़ गले में हार।। 53

मिटीं बीच की दूरियाँ, हुई धड़कनें तेज़।
टकरायीं सॉंसे गरम, कितनी ख़ुश थी सेज।। 54

मिलने की घड़ियॉं सुखद, किसे याद श्रृंगार?
गिरे ख़ुशी में झूम कर, गजरा, बिंदी, हार।। 55

दोनों ने मिल मिलन के, ऐसे गाये राग।
दिन उड़ गये कपूर से, रातें बीतीं जाग।। 56

याद न आया और कुछ, भूल गये सब काम।
ऑंखों-ऑंखों में हुई, जब बातें अविराम।। 57

अब उपवन की क्यारियां, याद न आती भूल।
सब की बैठक में सजे, बस कागज के फूल।। 58

गली-गली में फिर रहे, बधिक बदल कर वेश।
मन में छिपी कटारियां, वाणी में उपदेश।। 59

नजरें उसको ढूंढती, बार-बार जा द्वार।
उसका आना बंद है, जब से मिला उधार।। 60

सुबह, शाम, दिन, रात नित, जिसकी चाही खैर।
वह छोटी सी बात पर, निभा रहा है बैर।। 61

ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा, काली-गोरी देह।
मिटते देखे भेद सब, जब-जब पनपा नेह।। 62

बेटी कैसे देखती, नवजीवन की भोर।
जब पत्थर जैसे हुए, माता-पिता कठोर।। 63

भला परायों से करे, कोई भी क्या आस।
तोड़ रहे हैं आजकल, अपने ही विश्वास।। 64

कैसे चौकन्ना रहे, कोई व्यथित शिकार।
ले आया है अब बधिक, नये-नये हथियार।। 65

सपने जैसी हो गयीं, सपनों वाली रात।
जागे हैं यह सोचकर, करे न काई घात।। 66

सब अपने दुःख से दुःखी, सब ही दिखे अधीर।
कौन कहे किससे यहॉं, अपने मन की पीर।। 67

मंजिल क्यों मिलती उसे, बैठा रहा उदास।
स्वप्न उसी के सच हुए, जिसके मन थी आस।। 68

बुरा सोचता हो कोई, किन्तु सोच तू नेक।
जैसे को तैसा मिलें, बात याद रख एक।। 69

आते जाते शख्स से, कहे गली की धूल।
चाहे उड़ आकाश में, पृथ्वी को मत भूल।। 70

कौन महत्तम, कौन लघु, सब का अपना सत्व।
सदा ज़्ारूरत के समय, मालुम पड़ा महत्व।। 71

मन की शक्ति से सदा, चलता यह संसार।
टूट गया मन तो समझ, निश्चित अपनी हार।। 72

मिल पाता परिवेश जो, वैसे बनते आप।
एक तत्व के रूप हैं, पानी, हिम कण, भाप।। 73

पक्षपात, अन्याय को देख रहे जो मौन।
‘ठकुरेला’ संसार मे उसे मान दे कौन।। 74

जीवन भर संचित किया, पर न किया उपभोग।
निधि की रक्षा कर रहे, विषधर से वे लोग।। 75

चिंतन की उपज हैं, दुःख एवं आनन्द।
कैसे सुख आ पायेगा, जब मन दर हो बन्द।। 76

‘ठकुरेला’ संसार में, चाहे जितना बोल।
पर कहने से पूर्व ही, शब्द-शब्द को तोल।। 77

मृग-मरीचिका दे सकी, जग को तपती रेत।
जीवन के सन्दर्भ हैं, फसलों वाले खेत।। 78

कुछ दिन दुःख के आगये क्यों करता है खेद।
कौन पराया, कौन निज, खुल जायेगा भेद।। 79

सत्य बात करते रहो, किन्तु कहो रस घोल।
जिसने कड़वा सच कहा, आफत ले ली मोल।। 80

कैसे होगी प्रेम की, उसे कभी पहचान।
जो धन को ही मानता धर्म, कर्म, ईमान।। 81

रंग रूप सबका अलग, अलग अलग आकार।
चाक वही, माटी वही, सब का वही कुम्हार।। 82

जो समर्थ उसके लिए, अगम कौन सी बात।
खारे सागर से करे, सूरज मृदु बरसात।। 83

दुष्ट तजें कब दुष्टता, कुछ भी कह ले नीति।
उनको जीवन भर रूचे, अत्याचार, अनीति।। 84

दुनिया एक सराय सी, आते, जाते लोग।
जो जैसा खर्चा करे, वैसा भोगे भोग।। 85

निर्बल ने तो जिंदगी, काटी रह कर मौन।
भैंस लठैतों की रही, रोक सका है कौन।। 86

हाथ नहीं कुछ आ सका, गा कर थोथे गान।
मिला हमेशा ही उसे, जिसने ठानी ठान।। 87

रिश्तों की क्या अहमियत, जब तक नहीं सनेह।
बिना प्राण किस काम की, सुघड़, सुसज्जित देह।। 88

होठो पर मुस्कान रख, बन जायेंगे काम।
सरल हृदय के साथ प्रभु, हर दिन आठो याम।। 89

मन खाली-खाली रहा, करके संचित कोष।
सब निधियॉं फीकी लगीं, जब आया संतोष।। 90

बातें हों रस से भरी, परहित वाले काम।
लोग लिखेंगे आपका, अपनों में ही नाम।। 91

इस विराठ संसार में, दुःखी न केवल आप।
सब की ही मजबूरियाँ, सब के ही सन्ताप।। 92

 

 

 

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