दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 6

दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 6

यद्यपि सुंदर सुघर पुनि सगुणौ दीपक देह।
तऊ प्रकास करै तितो भरिए जितो सनेह॥

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ॥

रच्यौ रँगीली रैनमें, होरीके बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह॥

रूप सुधा-आसव छक्यो, आसव पियत बनै न।
प्यालैं ओठ, प्रिया बदन, रह्मो लगाए नैन॥

ललन चलनु सुनि पलनु में अंसुवा झलके आइ।
भई लखाइ न सखिनु हँ, झूठैं ही जमुहाइ॥

लिखन बैठि जाकी सबिह, गहि-गहि गरब गरूर।
भये न केते जगत के, चतुर चितेरे कूर॥

लोचनचपल कटाच्छ सर, अनियारे विष पूरि।
मन मृग बेधौं मुनिन के, जगजन सहित विसूरि॥
वे न इहाँ नागर भले जिन आदर तौं आब।
फूल्यो अनफूल्यो भलो गँवई गाँव गुलाब॥

सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर॥
(किसी ने उनके दोहों के बारे में कहा है)

स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा देखु विहंग विचारि।
बाज पराये पानि पर तू पच्छीनु न मारि॥

स्वेद सलिल रोमांच कुस गहि दुलही अरु नाथ।
हियौ दियौ संग हाथ के हथलेवा ही हाथ॥

सघन कुंज घन, घन तिमिर, अधिक ऍंधेरी राति।
तऊ न दुरिहै स्याम यह, दीप-सिखा सी जाति॥

सघन कुंज छाया सुखद सीतल सुरभि समीर।
मन ह्वै जात अजौं वहै उहि जमुना के तीर॥

सीरैं जतननि सिसिर ऋतु सहि बिरहिनि तनताप।
बसिबे कौं ग्रीषम दिनन परयो परोसिनि पाप॥

सुनी पथिक मुँह माह निसि लुवैं चलैं वहि ग्राम।
बिनु पूँछे, बिनु ही कहे, जरति बिचारी बाम॥

सोनजुही सी जगमगी, अँग-अँग जोवनु जोति।
सुरँग कुसुंभी चूनरी, दुरँगु देहदुति होति॥

सोहत ओढ़ैं पीतु पटु स्याम, सलौनैं गात।
मनौ नीलमनि-सैल पर आतपु परयो प्रभात॥

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