दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 4

दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 4

 

ढीठि परोसिनि ईठ ह्वै कहे जु गहे सयान।
सबै सँदेसे कहि कह्यो मुसुकाहट मैं मान॥

तच्यो ऑंच अति बिरह की रह्यो प्रेम रस भींजि।
नैनन के मग जल बहै हियो पसीजि पसीजि॥

तर झरसी, ऊपर गरी, कज्जल-जल छिरकाइ।
पिय पाती बिन ही लिखी, बाँची बिरह-बलाइ॥

तंत्रीनाद कबित्ता रस, सरस राग रति रंग।
अनबूड़े बूड़े, तिरे जे बूड़े सब अंग॥

तो पर वारौं उरबसी, सुनि राधिाके सुजान।
तू मोहन कैं उर बसी, ह्वै उरबसी समान॥

तौ लगि या मन-सदन में; हरि आवैं केहि बाट।
बिकट जटे जौ लौं निपट; खुले न कपट-कपाट॥

दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर चित प्रीति।
परति गाँठि दुरजन हिये, दई नई यह रीति॥

दीरघ सांस न लेहु दुख, सुख साईं हि न भूलि ।
दई दई क्यों करतु है, दई दई सु कबूलि ॥

दुसह दुराज प्रजान को क्यों न बड़े दुःख द्वंद ।
अधिक अंधेरो जग करत, मिलि मावस रविचंद॥

नए बिरह बढ़ती बिथा खरी बिकल जिय बाल।
बिलखी देखि परोसिन्यौं हरषि हँसी तिहि काल॥

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल।
अली कली ही सा बिंध्यों, आगे कौन हवाल॥

नाक मोरि नाहीं करै नारि निहोरें लेइ ।
छुवत ओठ बिय आँगुरिन बिरी बदन पिदेई॥

नासा मोरि, नचाइ दृग, करी कका की सौंह।
काँटे सी कसकै हिए, गड़ी कँटीली भौंह॥

नाहिंन ये पावक प्रबल, लूऐं चलति चहुँ पास।
मानों बिरह बसंत के, ग्रीषम लेत उसांस॥

नीकी लागि अनाकनी, फीकी परी गोहारि,
तज्यो मनो तारन बिरद, बारक बारनि तारि॥

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