दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 3

दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 3

चित पित मारक जोग गनि, भयौ भयें सुत सोग ।
फिरि हुलस्यौ जिय जोयसी समुझैं जारज जोग॥

चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न स्नेह गम्भीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर॥

छला छबीले लाल को, नवल नेह लहि नारि।
चूमति चाहति लाय उर, पहिरति धरति उतारि॥

छाले परिबे के डरनु सकै न हाथ छुवाइ।
झिझकति हियैं गुलाब कैं झवा झवावति पाइ॥

जगत जनायो जो सकल, सो हरि जान्यो नाहि।
जिमि ऑंखिनसब देखिए, ऑंखि न देखी जाहि॥

जनम ग्वालियर जानिये खंड बुंदेले बाल।
तरुनाई आई सुघर मथुरा बसि ससुराल॥

जपमाला, छापैं, तिलक सरै न एकौ कामु।
मन-काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु॥

जो चाहै चटक न घटै; मैलो होय न मित्ता।
रज राजस न छुवाइये; नेह चीकने चित्ता॥

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