दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 1

दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari part 1

अजौ तरौना ही रह्यो सुति सेवत इक अंग ।
नाक बास बेसर लहयो बसि मुकुतन के संग॥

अजौं न आए सहज रंग, बिरह दूबरे गात ।
अब ही कहा चलायति ललन चलन की बात॥

अति अगाधा अति ऊथरो; नदी कूप सर बाय।
सो ताको सागर जहाँ जाकी प्यास बुझाय॥

अधर धरत हरि के परत, ओंठ, दीठ, पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्र धनुष दुति होति॥

अंग-अंग नग जगमगैं, दीपसिखा-सी देह।
दियो बढाएँ ही रहै, बढो उजेरो गेह॥

आजु सबारे हौं गयी, नंदलाल हित ताल।
कुमुद कुमुदिनी के भटू, निरखे औरै हाल॥

आड़े दै आले बसन जाड़े हूँ की राति।
साहसु ककै सनेहबस, सखी सबै ढिग जाति॥

इक भींजे चहले परे बूड़े बहे हजार।
किते न औगुन जग करत नै बै चढ़ती बार॥

इत आवति चलि जाति उत, चली छसातक हाथ।
चढ़ी हिडोरैं सी रहै, लगी उसाँसनु साथ॥

इन दुखिया अँखियान कौं, सुख सिरजोई नाहिं।
देखत बनै न देखते, बिन देखे अकुलाहिं॥

उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान॥

औंधाई सीसी सुलखि, बिरह विथा विलसात।
बीचहिं सूखि गुलाब गो, छीटों छुयो न गात॥

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