दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari  5

दोहे-बिहारी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita- Bihari  5

पति आयो परदेस ते, ऋतु बसंत की मानि।
झमकि झमकि निज महल में, टहलैं करैं सुरानि॥

प्रगट भए द्विजराज-कुल, सुबस बसे ब्रज आइ।
मेरे हरौ कलेस सब, केसव केसवराइ॥

परतिय दोष पुरान सुनि, लखि मुलकी सुख दानि ।
कस करि रानी मिश्रहू, मुँह आई मुसकानि॥

पलनु पीक, अंजनु अधर, धरे महावरु भाल।
आजु मिले सु भली करी, भले बने हौ लाल॥

पत्रा ही तिथी पाइये, वा घर के चहुँ पास।
नित प्रति पून्यौ ही रहे, आनन-ओप उजास॥

फूलनके सिर सेहरा, फाग रंग रँगे बेस।
भाँवरहीमें दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस॥

बढ़त बढ़त संपति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटै बरु समूल कुम्हिलाय॥

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सोह करे, भौंहनु हंसे दैन कहे, नटि जाय॥

बहकि न इहिं बहनापने जब तब बीर विनास ।
बचै न बडी सबील हूँ, चील घोसुवा माँस॥

बहु धन लै अहसान कै, पारो देत सराहि ।
बैद बधू, हँसि भेद सौं, रही नाह मुँह चाहि॥

बंधु भए का दीन के, को तरयो रघुराइ ।
तूठे-तूठे फिरत हो झूठे बिरद कहाइ ॥

बामा भामा कामिनी, कहि बोले प्रानेस।
प्यारी कहत लजात नहीं, पावस चलत बिदेस॥

बेसरि मोती दुति-झलक परी ओठ पर आइ।
चूनौ होइ न चतुर तीय क्यों पट पोंछयो जाइ॥

बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन-तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की छाँहौं चाहति छाँह॥

भीण्यो केसर रंगसूँ लगे अरुन पट पीत।
डालै चाँचा चौकमें गहि बहियाँ दोउ मीत॥

भूषन भार सँभारिहै, क्यौं इहि तन सुकुमार।
सूधे पाइ न धर परैं, सोभा ही कैं भार॥

मति न नीति गलीत यह, जो धन धरिये ज़ोर।
खाये खर्चे जो बचे तो ज़ोरिये करोर॥

मानहुँ विधि तन अच्छ छबि स्वच्छ राखिबे काज।
दृग पग पोंछन को कियो भूखन पायंदाज॥

मूड चढाऐऊ रहै फरयौ पीठि कच-भारु।
रहै गिरैं परि, राखिबौ तऊ हियैं पर हारु॥

मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तनु की झाँई परे, स्याम हरित दुति होय॥

मैं समुझ्यो निराधार, यह जग काचो काँच सो।
एकै रूप अपार, प्रतिबिम्बित लखिए तहाँ॥

मैं ही बौरी विरह बस, कै बौरो सब गाँव।
कहा जानि ये कहत हैं, ससिहिं सीतकर नाँव॥

मोर मुकुट कटि काछनी कर मुरली उर माल।
यहि बानिक मो मन बसौ सदा बिहारीलाल॥

मोहनि मूरत स्याम की अति अद्भुत गति जोय।
बसति सुचित अन्तर तऊ प्रतिबिम्बित जग होय॥

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