दोहे-कविता-परमजीत कौर रीत-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Paramjeet Kaur Reet

दोहे-कविता-परमजीत कौर रीत-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Paramjeet Kaur Reet

 

होली पे सब रंग हों, मिलने को तैयार
रिश्ते मीठे कर रही, गुझिया की मनुहार

तेल उबलकर कह उठा, न्याय करे सरकार
गुझिया को ही क्यों मिले, संरक्षण-अधिकार

कूद पड़ी मैदान में, गुझिया थी तैयार
संघर्षों के तेल से, किये हाथ दो-चार

चखकर गुझिया झूमते, जैसे तन-मन-गात
भाँग-ठँडाई में कहाँ, ऐसी होती बात

कहने को कुछ भी कहो, गुझिया हो या ‘रीत’
ऊपर से हैं खुरदरी, अंतस मावा मीत

किसलय लें अँगड़ाइयाँ, पुष्प पढ़ें शृंगार
पी वसंत-रस माधुरी, झूम रहा संसार

पंख बिना उड़ने लगी, पहन पीत वह चीर
कानों में ऋतु-शीत के, क्या कह गया समीर

सुरभित हैं अमराइयाँ, मीठी हुई बयार
कोयल बिरहा कूक से, छेड़ रही मन-तार

गिन-गिन बीते दिवस तब, सरसों आई गोद
ओढ पीयरी माँ धरा, निरखे होकर मोद

पीत-वर्ण जोड़ा पहन, पगड़ी फूल अनंत
ग्रीष्म-वधू को ब्याहने, देखो चला बसंत

जंगल में मंगल लगे, तब जीवन पर्यंत
सभी ओर आनंद हो, मन में अगर बसंत

 

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