दोहे -कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji-4

-दोहे -कबीर जी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kabir Ji-4

दया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोय ॥

दस द्वारे का पिंजरा, ता में पंछी कौन ।
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥

दान दिए धन ना घटे, नदी न घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों कह गए कबीर ॥

दिल का महरम ना मिला, जो मिला सो गर्जी ।
कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥

दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥

दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय ।
बिना जीभ की हाय से, लोह भस्म हो जाय ॥

दुर्लभ मानुष जन्म है, होय न बारम्बार ।
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिंम नहीं शीतल होय ।
कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय ॥

नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥

पतिवृता मैली भली, काली कुचल कुरूप ।
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-परजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥

प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम ।
कहे कबीर सेवक नहीं, चाहै चौगुना दाम ॥

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥

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