देश किन्नरों को दे दो- कविता -मनोहर लाल ‘रत्नम’ सहदेव-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Manohar Lal Ratnam Sahdev 

देश किन्नरों को दे दो- कविता -मनोहर लाल ‘रत्नम’ सहदेव-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Manohar Lal Ratnam Sahdev

देश नारों से घिरा, मैं हर सितम को सह रहा हूँ,
आँख के आंसू मैं देखो अब खडा मैं बह रहा हूँ।
और अत्त्याचार मुझसे देश मैं देखे न जाएं–
आज शिव सा ही गरल मैं पान करके कह रहा हूँ॥
भावना बैठी कहाँ है आप भी मन को कुरेदो।
आप के बस का ना हो तो, देश किन्नरों को दे दो॥

नारियों की रक्षा के विश्वास अब तो घट रहे हैं,
दूध पीते बालकों के सर यहाँ पर कट रहे हैं।
सीना ताने हम खड़े हैं और पौरुष मौन सारा–
आज धर्म के सहारे लोग देखो बंट रहे हैं॥
है कहाँ ऐसा मसीहा फिर से सूली पर चदे जो।
आप के बस का न हो तो, देश किन्नरों को दे दो॥

जल रहे कश्मीर की बस्तियां बतला रही हैं,
मौत की काली घटायें आज भी मंडरा रही हैं।
लाल है सिंदूर से बढ़ कर सुनो कश्मीर घाटी–
रोटियों पर वार करती बोटियाँ बल खा रही हैं॥
आप मानव की आज़ादी का नया हल भी सहेजो।
आप के बस का न हो तो, देश किन्नरों को दे दो॥

देख लो आतंकवादी सर हमारे काटते हैं,
खून अपनों का बहाकर, रोज़ ही वह चाटते हैं।
आप बोलो, आपने भी, कब कहाँ अंकुश लगाया–
उग्रवादी रोज़ खाई, लाशों से अब पाटते हैं॥
तोड़ दो वह हाथ, अपनों पर अगर फिर से उठे जो।
आप के बस का न हो तो, देश किन्नरों को दे दो॥

दे यदि किन्नरों को सत्ता, देश यह फूले फलेगा,
आतंकवादी ढूंढने से, फिर न भारत में मिलेगा।
टेकते घुटने रहेंगे, देश के दुश्मन ही सारे–
तालियों की ताल पर जब, राज किन्नरों का चलेगा॥
भारत में घुसपैठ ‘रत्नम’ किसकी फिर हिम्मत करे जो।
आप के बस का न हो तो, देश किन्नरों को दे दो॥

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