देशयात्रा खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

देशयात्रा खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

बोहित भरे, चला लेइ रानी । दान माँगि सत देखै दानी ॥
लोभ न कीजै, दीजै दानू ।दान पुन्नि तें होइ कल्यानू ॥
दरब-दान देवै बिधि कहा । दान मोख होइ, बाँचै मूरू ॥
दान करै रच्छा मँझ नीरा । दान खेइ कै लावै तीरा ॥
दान करन दै दुइ जग तरा । रावन संचा अगिनि महँ जरा ॥
दान मेरु बढ़ि लागि अकासा । सैंति कुबेर मुए तेहि पासा ॥

चालिस अंस दरब जहँ एक अंस तहँ मोर ।
नाहिं त जरै कि बूड़ै, कि निसि मूसहिं चोर ॥1॥

 

सुनि सो दान राजै रिस मानी । केइ बौराएसि बौरे दानी ॥
सोई पुरुष दरब जेइ सैंती । दरबहिं तैं सुनु बातैं एती ॥
दरब तें गरब करै जे चाहा । दरब तें धरती सरग बेसाहा ॥
दरब तें हाथ आव कविलासू । दरब तें अछरी चाँड न पासू ॥
दरब तें निरगुन होइ गुनवंता । दरब तें कुबज होइ रूपवंता ॥
दरब रहै भुइँ दिपै लिलारा । अस मन दरब देइ को पारा?॥
दरब तें धरम करम औ राजा । दरब तें सुद्ध बुद्धि बल गाजा ॥

कहा समुद्र , रे लोभी! बैरी दरब, न झाँपु ।
भएउ न काहू आपन, मूँद पेटारी साँपु ॥2॥

 

आधे समुद ते आए नाहीं । उठी बाउ आँधी उतराहीं ॥
लहरैं उठीं समुद उलथाना । भूला पंथ, सरग नियराना ॥
अदिन आइ जौ पहुँचै काऊ । पाहन उड़ै सो घाऊ ॥
बोहित चले जो चितउर ताके । भए कुपंथ, लंक-दिसि हाँके ॥
जो लेइ भार निबाह न पारा । सो का गरब करै कंधारा?॥
दरब-भार सँग काहु न उठा । जेइ सैता ताही सौं रुठा ॥
गहे पखान पंखि नहिं उड़ै । `मौर मौर’ जो करै सो बुड़ै ॥

दरब जो जानहि आपका, भूलहिं गरब मनाहिं ।
जौ रे उठाइ न लेइ सके, बोरि चले जल माहिं ॥3॥

 

केवट एक बिभीषन केरा । आव मच्छ कर करत अहेरा ॥
लंका कर राकस अति कारा । आवै चला होइ अँधियारा ॥
पाँच मूँड, दस बाहीं ताही । दहि भा सावँ लंक जब दाही ॥
धुआँ उठै मुख साँस सँघाता । निकसै आगि कहै जौ बाता ॥
फेंकरे मूंड चँवर जनु लाए । निकसि दाँत मुँह-बाहर आए ॥
देइ रीछ कै रीछ डेराइ । देखत दिस्टि धाइ जनु खाई ॥
राते नैन नियर जौ आवा । देखि भयावन सब डर खावा ॥

धरती पायँ सरग सिर, जनहुँ सहस्राबाहु ।
चाँद सूर और नखत महँ अस देखा जस राहु ॥4॥

 

बोहित बहे, न मानहि खेवा । राजहिं देखि हँसा मन देवा ॥
बहुतै दिनहि बार भइ दूजी । अजगर केरि आइ भुख पूजी ॥
यह पदमिनी विभीषन पावा । जानहु आजु अजोध्या छावा ॥
जानहु रावन पाई सीता । लंका बसी राम कहँ जीता ॥
मच्छ देखि जैसे बग आवा । टोइ टोइ भुइँ पावँ उठावा ॥
आइ नियर होइ किन्ह जोहारू । पूछा खेम कुसल बेवहारू ॥
जो बिस्वासघात कर देवा । बड़ बिसवास करै कै सेवा ॥

कहाँ, मीत! तुम भूलेहु औ आएहु केहि घाट?।
हौं तुम्हार अस सेवक, लाइ देउँ तोहि बाट ॥5॥

 

गाढ़ परे जिउ बाउर होई । जो भलि बात कहै भल सोई ॥
राजै राकस नियर बोलावा । आगे कीन्ह, पंथ जनु पावा ॥
करि विस्वास राकसहि बोला । बोहित फेरू, जाइ नहिं डोला ॥
तू खेवक खेवकन्ह उपराहीं । बोहित तीर लाउ गहि बाहीं ॥
तोहिं तें तीर घाट जौ पावौं नोगिरिही तोड़ेर पहिरावौं ॥
कुंडल स्रवन देउँ पहिराई । महरा कै सौंपौं महराई ॥
तस मैं तोरि पुरावौं आसा । रकसाई कै रहै न बासा ॥

राजै बीरा दीन्हा, नहिं जाना बिसवास ॥
बग अपने भख कारन होइ मच्छ कर दास ॥6॥

 

राकस कहा गोसाइँ बिनाती । भल सेवक राकस कै जाती ॥
जहिया लंक दही श्रीरामा । सेव न छाँडा दहि भा सामा ॥
अबहूँ सेव करौं सँग लागे । मनुष भुलाइ होउँ तेहि आगे ॥
सेतुबंध जहँ राघव बाँधा । तहँवाँ चढ़ौं भार लेइ काँधा ॥
पै अब तुरत धान किछु पावौं । तुरत खेइ ओहि बाँध चढ़ावौं ॥
तुरत जो दान पानि हँसि दीजै । थोरै दान बहुत पुनि लीजै ॥
सेव कराइ जो दोजै दानू । दान नाहिं, सेवा कर मानू ॥

दिया बुझा, सत ना रहा हुत निरमल जेहि रूप ।
आँधी वोहित उड़ाइ कै लाइ कीन्ह अँधकूप ॥7॥

 

जहाँ समुद मझधार मँडारू । फिरै पानि पातार-दुआरू ॥
फिर फिरि पानि ठाँव ओहि मरै । फेरि न निकसै जो तहँ परै ॥
ओही ठाँब महिरावन-पुरी । परे हलका तर जम-कातर छुरी ॥
ओही ठाँव महिरावन मारा । पूरे हाड़ जनु खरे पहारा ॥
परी रीढ़ जो तेहि कै पीठी । सेतुबंध अस आवै दीठी ॥
राकस आइ तहाँ के जुरे । बोहित भँवर-चक महँ परे ॥
फिरै लगै बोहित तस आई । जस कोहाँर धरि चाक फिराई ॥

राजै कहा, रे राकस! जानि बूझि बौरासि ।
सेतुबंध यह देखै; कस न तहाँ लेइ जासि ॥8॥

 

`सेतुबंध’ सुनि राकस हँसा । जानहु सरग टूटि भुइँ खसा ॥
को बाउर? बाउर तुम देखा । जो बाउर, भख लागि सरेखा ॥
पाँखी जो बाउर घर माटी । जीभ बढ़ाइ भखै सब चाँटी ॥
बाउर तुम जो भखै कहँ आने । तबहिं न समझे, पंथ भुलाने ॥
महिरावन कै रीढ़ जो परी । कहहु सो सेतुबंध, बुधि छरी ॥
यह तो आहि महिरावन-पुरी । जहवाँ सरग नियर, घर दुरी ॥
अब पछिताहु दरब जस जोरा । करहु सरग चढ़ि हाथ मरोरा ॥

जो रे जियत महिरावन लेत जगत कर भार ।
सो मरि हाड़ न लेइगा, अस होइ परा पहार ॥9॥

 

बोहित भवँहिं, भँवै सब पानी । नाचहिं राकस आस तुलानी ॥
बूडहिं हस्ती , घोर, मानवा । चहुँदिशि आइ जुरे मँस-खवा ॥
ततखन राज-पंखि एक आवा । सिखर टूट जस डसन डोलावा ॥
परा दिस्टि वह राकस खोटा । ताकेसि जैस हस्ति बड़ मोटा ॥
आइ होही राकस पर टूटा । गहि लेइ उड़ा, भँवर जल छूटा ॥
बोहित टूक टूक सब भए । एहु न जाना कहँ चलि गए ॥
भए राजा रानी दुइ पाटा । दूनौं बहे, चले दुइ बाटा ॥

काया जीउ मिलाइ कै, मारि किए दुइ खंड ।
तन रोवै धरती परा; जीउ चला बरम्हंड ॥10॥

 

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