देशत्याग-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

देशत्याग-किसान -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Kisan

देशत्याग

एक जन ने यों त्रिवेणी-तीर पर मुझ से कहा-
“तरस मुझको आ रहा है देख कर तुमको अहा!
तुम दुखी-से दीखते हो, क्या तुम्हें कुछ कष्ट है?
कठिन है निर्वाह भी, यह देश ऐसा नष्ट है! ॥1॥

“यह अवस्था और सूखे फूल-सा यह मुख हुआ,
जान पड़ता है, कभी तुम को नहीं कुछ सुख हुआ!
किन्तु अब चिन्ता नहीं, तुम पर हुई प्रभु की दया,
जान लो, बस, आज से ही दिन फिरे, दुख मिट गया! ॥2॥

“शीघ्र मैं साहब बहादुर से मिलाऊँगा तुम्हें,
नौकरी-पर मालिकी-सी मैं दिलाऊँगा तुम्हें।
वस्त्र-भोजन और पन्द्रह का महीना, धाम भी,
काम भी ऐसा कि जिसमें नाम भी, आराम भी ॥3॥

“सैर सागर की करोगे दृश्य देख नये नये,
जानते हो तुम पुरी को? द्वारिका भी हो गये?
यह बहू है? ठीक है बस, भाग्य ने अवसर दिया,
याद मुझको भी करोगे, या किसी ने हित किया”! ॥4॥

मैं चकित सा रह गया, यह मनुज है या देवता;
पर लगा पीछे मुझे उस “आरकाटी” का पता!
सावधान! स्वदेशवासी, हा! तुम्हारे देश में-
घूमते हैं दुष्ट दानव मानवों के वेश में! ॥5॥

सजग रहना, सत्य-वेशी झूठ है छलता यहाँ,
देव-वेशी दस्यु-दल की बढ़ रही खलता यहाँ।
प्रकृत पापी भी यहाँ पर साधु फिरते हैं बने,
देखना, सर्वत्र उन के जाल फैले हैं घने! ॥6॥

रात तक हमको फँसा कर वह “डिपो” में ले गया,
घेर कोई ढोर कांजीहौस में ज्यों दे गया!
और भी पशु-सम वहाँ कितने अभागे थे घिरे,
हाय! दलदल से निकलकर हम अनल में जा गिरे! ॥7॥

उस नरक के द्वार को ही देख कुलवन्ती डरी,
डूब कर ही क्या रहेगी अन्त में जीवन-तरी।
जानता था मैं कि मैंने दुःख भोग लिए सभी,
किन्तु दुःख अपार हैं, पूरे नहीं होते कभी! ॥8॥

हो चुके सर्वस्व खो कर दीन से भी दीन थे,
किन्तु फिर भी हम अभी तक सर्वथा स्वाधीन थे।
आज मुक्त समीर में वह साँस लेना भी चला,
हो गया संकीर्ण नभ, घुटने लगा मानों गला! ॥9॥

किन्तु क्या करते, विवश थे, हम वचन थे दे चुके,
आप ही थे आपदा का भार सिर पर ले चुके।
कौन फँसता है निकलने के लिए दृढ़ जाल में?
दैव ने यह भी लिखा था इस कठोर कपाल में! ॥10॥

शीघ्र ही ‘साहब बहादुर’ ने हमें दर्शन दिये,
और झट ‘हाँ’ भी कराली ‘फिजी’ जाने के लिये!
जानते थे हम न तब भी यह कि केवल एक ‘हाँ’
पाँच बरसों के लिए रौरव नरक देती यहाँ! ॥11॥

देख लो, अब वह अतल जल सामने लहरा रहा,
काल का-सा केतु वह जलयान पर फहरा रहा।
यह हमारी सिन्धु-यात्रा हो महायात्रा कहीं,
फेर दे तो क्यों न हम पर सिन्धु तू पानी यहीं! ॥12॥

हाय रे भारत! तुझे इतना हमारा भार है-
जो हमारा अन्त भी तुझको नहीं स्वीकार है!
मृत्यु हित भी सात सागर पार जाना है हमें,
स्वर्ग के बदले वहाँ भी नरक पाना है हमें! ॥13॥

पूछने पर यह कि “कैसे है हुआ आना यहाँ,”
आर्यभूमि! हमें बता दे, क्या कहेंगे हम वहाँ?
बोल, यह कह दें कि तेरी कीर्ति करने के लिए,
या यही कह दें कि अपनी मौत मरने के लिए! ॥14॥

हड्डियाँ घोली तथा शोणित सुखाया है सदा,
उर्वरा करके तुझे दी है हमी ने सम्पदा।
और भारतभूमि! तुझ से हा! हमी वंचित रहे,
याद तो कर तू कि हमने कष्ट कितने हैं सहे ॥15॥

अन्नपूर्णारूपिणी माँ! तू हमें है छोड़ती,
हाय! माँ होकर सुतों से तू स्वयं मुँह मोड़ती!
तो बिदा दे अब हमें, तू भोगती रह सुख सभी,
हम सदा तेरे, न चाहे तू हमारी हो कभी! ॥16॥

बस, जहाज! चले चलो, अब डगमगाना छोड़ दो,
पवन! तुम भी सिन्धु में लागें लगाना छोड़ दो।
देखने को सभ्ययुग के दृश्य हम हैं जा रहे,
किन्तु भीतर और बाहर क्यों हिलोरे आ रहे! ॥17॥

हम कुली थे और काले, गगन से मानों गिरे,
पशु-समान जहाज में थोड़ी जगह में थे घिरे!
भंगियों का काम भी परवश हमें करना पड़ा।
और कुत्तों की तरह पापी उदर भरना पड़ा! ॥18॥

मृत्यु का मुख-सा हमारे अर्थ रहता था खुला,
रोटियाँ पाते गिनी हम और पानी भी तुला!
बहुत हो तो गालियाँ खावें तथा आँसू पियें,
पूछता था कौन फिर चाहे मरें चाहे जियें! ॥19॥

बहुत लोग जहाज में ही कष्ट पा कर मर गये,
धन्य थे वे शीघ्र ही जो सब दुखों से तर गये!
जो मरा फेंका गया तृण-तुल्य सागर-नीर में,
हड्डियां भर पा सके जलचर विनष्ट शरीर में! ॥20॥

दूर चारों ओर मानों सिन्धु नभ में था धंसा,
बीच में गतिशील भी, जलयान मानों था फँसा।
ज्ञात होता था यही-अब निकलना सम्भव नहीं,
मर मिटेंगे बीच में हम सब यहीं दब कर कहीं! ॥21॥

त्योरियाँ अधिकारियों की बरछियाँ-सी हूलती,
दृष्टियाँ तलवार-सी सिर पर सदा थी झूलती।
वध्य पशु-सम अर्द्धमृत हम तीन मास सड़ा किये।
तब कहीं जा कर फिजी ने सामने दर्शन दिये! ॥22॥

कैदियों-सा पुलिस ने आकर हमें घेरा वहाँ,
काल की-सी कोठड़ी में फिर मिला डेरा वहाँ।
नींद भी डर से न सहसा कर सकी फेरा वहाँ,
दीखता था बस हमें अन्धेर-अन्धेरा वहाँ! ॥23॥

दैव! ला पटका कहाँ, हा! हम कहाँ भारत कहाँ;
जन्म पाया था वहाँ, आये तथा मरने यहाँ।
सो गया जब तक न मैं यों ही व्यथा होती रही,
किन्तु कुलवन्ती न सोई, रात भर रोती रही! ॥24॥

 

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