देख कर कुर्ते गले में सब्ज़ धानी आप की-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

देख कर कुर्ते गले में सब्ज़ धानी आप की-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

देख कर कुर्ते गले में सब्ज़ धानी आप की
धान के भी खेत ने अब आन मानी आप की

क्या तअज्जुब है अगर देखे तो मुर्दा जी उठे
चैन नेफ़ा की ढलक पेड़ू पे आनी आप की

हम तो क्या हैं दिल फ़रिश्तों का भी काफ़िर छीन ले
टुक झलक दिखला के फिर अंगिया छुपानी आप की

आ पड़ी दो-सौ बरस के मुर्दा-ए-बे-जाँ में जान
जिस के ऊपर दो घड़ी हो मेहरबानी आप की

इक लिपट कुश्ती की हम से भी तो कर देखो ज़रा
हाँ भला हम भी तो जानें पहलवानी आप की

छल्ले ग़ैरों पास है वो ख़ातम-ए-ज़र ऐ निगार
है हमारे पास भी अब तक निशानी आप की

वक़्त तो जाता रहा पर बात बाक़ी रह गई
है ये झूटी दोस्ती अब हम ने जानी आप की

क्या अजब सूरत रक़ीब-ए-रू-सियह की देख कर
ख़ौफ़ से हालत हुई हो पानी पानी आप की

एक आलम कोहकन की तरह सर फोड़ेगा अब
गर इसी सूरत रही शीरीं-ज़बानी आप की

क्या हमें लगती है प्यारी जब वो कहती है ‘नज़ीर’
है मियाँ कुछ इन दिनों ना-मेहरबानी आप की

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