देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि वीरों की परिपाटी का
मैं ही योद्धा मैं ही साक्षी राणा की हल्दीघाटी का
जिस भूमि ने वीर उगाए टीपू और शिवाजी सम
जहाँ भगत सिंह पनपे थे मैं लाल हूँ ऐसी माटी का
मैं एकलव्य हूँ चढ़ा अँगूठा जिसने द्रोण का मान किया
देखो मैं वही कर्ण हूँ जिसने कवच इंद्र को दान किया
भीष्म प्रतिज्ञा कर ली जिसने संकल्पों का पुतला बन
मैं वही देवव्रत शर शय्या पर जिसने युद्ध विराम किया
राज पाट को तुच्छ समझकर वन में जाता राम हूँ मैं
दुराचार पर अंकुश हूँ और पापों पर पूर्ण विराम हूँ मैं
मैं ही भारत का वो गौरव लिखा गया जो सदियों में
लड़ा गया जो बरसों तक वो आजादी का संग्राम हूँ मैं

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