दुनियां में-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

दुनियां में-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

की वस्ल में दिलबर ने इनायत, तो फिर क्या?
या जु़ल्म से दी हिज्र की आफ़ात, तो फिर क्या?
गुस्सा रहा, या प्यार से की बात, तो फिर क्या?
गर ऐश से इश्रत में कटी रात तो फिर क्या?
और ग़म में बसर हो गई औकात, तो फिर क्या?॥1॥

मजनूं की तरह हमने अगर दिल को लगाया।
बेचैन किया रूह को और तन को सुखाया।
दिलबर ने भी लैला की तरह दिल को लुभाया।
जब आई अजल फिर कोई ढूंढा तो न पाया।
क़िस्सों में रहे हुर्फ़ो-हिकायात तो फिर क्या?॥2॥

जिस शेख परी ज़ाद की आ दिल से हुई चाह।
हर रोज मिले उससे, रहे ऐश के हमराह।
हंसना भी हुआ, बातें भी अच्छी हुई दिलख़्वाह।
हल बोसो किनार और जो था, उसके सिवा आह!
गर वह भी मयस्सर हुआ, है हात तो फिर क्या?॥3॥

थे वह जो दुरो-लाल से बेहतर लबो-दन्दां।
आखि़र को जो देखा तो मिले ख़ाक में यक्सां।
जिन आंखों को मिलना हो, भला ख़ाक के दरमियां।
दो दिन अगर उन आंखों ने दुनियां में मेरी जां।
की नाज़ अदाओं की इशारात, तो फिर क्या हुआ?॥4॥

दुनियाँ में अगर हमको मिला तख़्ते सुलेमा।
तावे रहे सब जिन्नो परी आदमो मुर्गां।
जब तन से हवा हो गई वह पोदने सी जां।
फिर उड़ गई एक आन में सब हश्मतो सब शां।
ले शर्क़ से ता ग़र्ब लगा हात, तो फिर क्या?॥5॥

दोलत में अगर हम हुए दाराओ सिकन्दर।
और सात विलायत पे किया हुक्म सरासर।
जब आई अजल फिरन रहा तख़्त ओ अफ़सर।
अस्पो शुतरो फ़ीलो ख़रो नौबतो लश्कर।
गर कब्र तलक अपने चला सात, तो फिर क्या?॥6॥

कामिल हो अगर रोशनी की दिल की अंधेरी।
और बागे-तसर्रुफ़ से करिश्मात की फेरी।
जब आई अजल फिर न चली मेरी न तेरी।
आखि़र को जो देखा तो हुए ख़ाक की ढेरी।
दो दिन की हुई कश्फ़ो-करामात, तो फिर क्या?॥7॥

तायर की तरह से उड़े हम गर्चे हवा पर।
या अर्ज़ को तै कर गए ग़ोता सा लगाकर।
दरिया पे चले ऐसे कि पाँ भी न हुए तर।
जब आई अजल, आह! तोएक दम में गए मर।
गर यह भी हुई हम में करामात, तो फिर क्या?॥8॥

हुजरे में अगर बैठ के हम हो गए दरवेश।
और चिल्ला कशी करके हमेशा रहे दिलरेश।
आबिद हुए, ज़ाहिद हुए, सरताज हक़ अन्देश।
जब आई अजल, एक रियाजत न गई पेश।
मर-मर के जो की कोशिशे-ताआत तो फिर क्या?॥9॥

मै पीके अगर हो गए, हम मस्तो ख़राबी।
होंठों से जुदा की, न कभी मैं की गुलाबी।
की लाख तरह ऐश की मस्तीयो ख़राबी।
जब आई अजल, फिर वहीं उठ भागे शिताबी।
रिन्दों में हुए अहले ख़राबात, तो फिर क्या?॥10॥

आमिल हुए हम लाख अगर नक़्शे अजल से।
लोगों को बचाने लगे भूतों के ख़लल से।
जब आई अजल फिर न चला और अजल से।
दो दिन की जो ताबीजों फ़तीलाओ-अमल से।
तसख़ीर किया आलमे जिन्नात, तो फिर क्या?॥11॥

पढ़ इल्मे रियाजी जो मुनज्जिम हुए धूमी।
पेशानी महो ज़हराओ बिरजीस की चूमी।
आखि़र को अजल सर के ऊपर आन के घूमी।
इस उम्र दो रोज़ा में अगर होके नजूमी।
सब छान लिए अर्ज़ो-समाबात, तो फिर क्या?॥12॥

गर हमने अतिब्बा हो तबाबत की रक़म ली।
चीज़ और सिवा तिब के सर अंजाम के कम ली।
जब तन के उपर मर्ग ने आ डाल दी कमली।
एक दम में हवा हो गए सब नज़रीयो अमली।
थे याद जो असबाबो अलामात तो फिर क्या?॥13॥

गर अपना हुआ मनसबो-जागीर का नक़्शा।
और एक को मर मर के मिला भीक का टुकड़ा।
क्या फ़र्क हुआ दोनों में जब मरना ही ठहरा।
उसने कोई दिन बैठ के आराम से खाया।
वह मांगता दर-दर फिर खै़रात तो फिर क्या?॥14॥

दुनियां में लगा मुफ़्लिसो-दर्वेश से ता शाह।
सब ज़र के तबलगार हैं ले माही से ता माह।
मरता है कोई माल पे ढूंढ़े है कोई जाह।
दौलत ही का मिलना है बड़ी चीज़ ‘नज़ीर’ आह।
बिल्फ़र्ज हुई इससे मुलाक़ात तो फिर क्या?॥15॥

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