दुनियाँ धोके की टट्टी है-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

दुनियाँ धोके की टट्टी है-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

यह पैंठ अजब है दुनियां की, और क्या क्या जिन्स इकट्ठी है।
यां माल किसी का मीठा है, और चीज़ किसी की खट्टी है।
कुछ पकता है कुछ भुनता है, पकवान मिठाई पट्टी है।
जब देखा खूब तो आखि़र को, न चूल्हा भाढ़ न भट्टी है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥1॥

कोई ताज ख़रीदे हंस-हंस कर, कोई तख़्त खड़ा बनवाता है।
कोई कपड़े रंगी पहने है, कोई गुदड़ी ओढ़े जाता है।
कोई भाई, बाप, चचा, नाना, कोई नाती पूत कहाता है।
जब देखा खूब तो आखि़र को, न रिश्ता है न नाता है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥2॥

कोई सेठ, महाजन, लाखपती, बज्जाज, कोई पंसारी है।
या बोझ किसी का हल्का है, और खेप किसी की भारी है।
क्या जाने कौन ख़रीदेगा, और किसने जिन्स उतारी है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को, दल्लाल न कोई व्योपारी है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥3॥

कोई फूल के बैठे मसनद पर, कोई रोये अपनी ज़िल्लत को।
कोई बोले अपना मुझसे लो, और मेरा हो सो मुझको दो।
कोई लड़ता है, कोई मरता है, कोई झगड़े हक़ पर नाहक़ को।
जब देखा खू़ब तो आखिर को कुछ लेना ए न देना दो॥
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥4॥

रम्माल, नुजूमी, आमिल है और फ़ाजिल, मुल्ला स्याना है।
कोई आक़िल कामिल दाना है, कोई मस्त पड़ा दीवाना है।
तावीज, फ़लीता, फ़ाल, फ़सूं और जादू मंतर लाना है।
जब देखा ख़ूब तो आखि़र को सब हीला मक्र बहाना है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥5॥

कोई लूटे कूंचे गलियों में, तैयार किसी का डेरा है।
कोई बाग़, कुआं बनवाना है और घेर किसी ने घेरा है।
नित क़िस्से झगड़े करते हैं, यह तेरा है यह मेरा है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को ना मेरा है ना तेरा है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥6॥

कहीं धूम मची है क़र्जों की, कहीं क़र्जों का दुख खेना है।
कोई हीरा पन्ना परखावे और बेचे कोई चैना है।
हर रोज़ तक़ाजा धरना है, दुख देना पैसा लेना है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को, कुछ लेना है न देना है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥7॥

कोई बनिया है कोई तेली है, कोई बेचे पान तमोली है।
कोई सर पर रख कर खींचे है, कोई बांधे फिरता झोली है।
कहीं गोन ढली है नाज़ों की, कहीं थैली थैला खोली है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को, एक दम की बोला ठोली है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥8॥

कोई टोपी पहने जाता है कोई बांध फिरे इमामा है।
कोई साफ़ बरहना फिरता है ना पगड़ी न पाजामा है।
कमख़्वाब, गज़ी और गाढ़े का, नित किस्सा है हंगामा है।
जब देखा खूब तो आखि़र को ना पगड़ी है ना जामा है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥9॥

कोई बाल बढ़ाये फिरता है, कोई सर को घोंट मुंडाता है।
कोई कपड़े रंगे पहने है, कोई नंगे मुंगे आता है।
कोई पूजा, कथा बखाने है, कोई छापा, तिलक लगाता है।
जब देखा ख़ूब तो आखि़र को सब छोड़ अकेला जाता है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥10॥

कोई रोता है, कोई हंसता है, कोई नाचे हैं कोई गाता है।
कोई छीने, झपटे, ले भागे, कोई घोंस धड़क्का लाता है।
कोई माल इकट्ठा करता है कोई कुंजी कु़फ़्ल लगाता है।
जब देखा खूब तो आखि़र को सब झगड़ा रगड़ा जाता है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥11॥

कोई बेचे भंग शराब, अफ़यू कहीं दूध दही की फेरी है।
कोई पल्ला सर पर लाता है, कोई लादे बैल मकेरी है।
कोई झगड़े अपनी जगह पर यह मेरी है यह तेरी है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को न तेरी है न मेरी है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥12॥

कहीं बल्ली टेवकी, थूनी है, कहीं घास करब कीं पूली है।
कहीं छलनी, छाज, पिटारे हैं, कहीं चूल्हा, चक्की, चूली है।
तरकारी बैंगन, साग, बड़ा, गुड़, गांडा, गाजर, मूली है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को सब छू यह देखत भूली है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥13॥

कहीं बान, अटेरी, टाट कड़ी कहीं दमरख, चमरख़, तकला है।
कहीं रोक रुपैया खुर्दा है कहीं कौड़ी पैसा धेला है।
कहीं ढाँच पलंग बिकता है, कहीं छींका रस्सी रस्सा है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को न पीढ़ी खाट न चरख़ा है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥14॥

कोई शकरा बाज़ उड़ाता है, कोई रक्खे हाथ पे तितली है।
शाबाश कोई ले बैठा है, और दोड़ किसी ने दुत ली है।
है तार किसी के हाथों में, और नाचती फिरती पुतली है।
जब देखा खू़ब तो आखि़र को, न रेशम सूत न सुतली है।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥15॥

अब किसका रंग बुरा कहिये, और किसका रूप भला कहिए।
एक दम की पैठ लगी है यह, अम्बोह मज़ा चर्चा कहिए।
यह सैर तमाशे देख “नज़ीर”, अब जा कहिए बेजा कहिए।
कुछ बात नहीं बन आती है चुपचाप पहेली क्या कहिए।
गु़ल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मट्टी है।
हम देख चुके इस दुनियां को, यह धोके की सी टट्टी है॥16॥

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