दुनियाँ के मरातिब क़ाबिले ऐतबार नहीं-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

दुनियाँ के मरातिब क़ाबिले ऐतबार नहीं-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

गर शाह सर पे रखकर अफ़सर हुआ, तो फिर क्या?
और बहरे सल्तनत का गौहर हुआ, तो फिर क्या?
माहीये, इल्म, मरातिव, पुर ज़र हुआ, तो फिर क्या?
नौबत, निशां, नक़ारा, दर पर हुआ तो फिर क्या?
सब मुल्क सब जहाँ का, सरवर हुआ तो फिर क्या?

क्या रख के फ़ौज लश्कर, की सल्तनत पनाही।
फेरी दुहाई अपनी, ले माह ता बा माही ।
जब आन कर फ़ना की, सर पर पड़ी तबाही।
फिर सर रहा न लश्कर, ने ताजे बादशाही।
दारा, अज़म, सिकन्दर, अकबर हुआ तो फिर क्या?

या ज़ात में कहाये, नामी असील, जाती।
जमशेद फ़र के पोते, नौशेरबाँ के नाती।
थे आप मिस्ल दूल्हा, और फ़ौज थी बराती।
जब चल बसे तो कोई, फिर संग था न साथी।
मुल्को, मकां, ख़जाना, लश्कर हुआ तो फिर क्या?

या राज बंसी होकर, दुनिया में राज पाया।
चित्तौर गढ़, सितारा, कालिंजर आ बनाया।
जब तोप ने अजल की आ मोर्चा लगाया।
सब उड़ गए हवा पर, कोई न काम आया।
गढ़, कोट, तोप, गोला, लश्कर हुआ, तो फिर क्या?

कितने दिनों यह गुल था, नव्वाब हैं यह खाँ हैं।
यह इब्न पंच हज़ारी, यह आली खानदां हैं।
जागीरो मालो मनसब, गो आज इनके हाँ हैं।
देखा तो एक घड़ी में, न नामो न निशां हैं।
दो दिन का शोर चर्चा, घर-घर हुआ, तो फिर क्या?

कहता था कोई देखो, यह हैं अमीर ख़ां जी।
और वह हैं खानख़ाना, और यह हैं मीर ख़ां जी।
पंजा उठा क़जा का, जब आके शेरखां जी।
फिर किसके मीर खां जी, किसके वज़ीर खां जी।
उम्दा, ग़नी, तवंगर, बाज़र हुआ, तो फिर क्या?

कहता था कोई घोड़ा, है नामदार ख़ां का।
यह पालकी यह हाथी, है जुल्फ़िक़ार ख़ां का।
आया क़दम अजल के, जब तीस मार ख़ां का।
ख़र भी कहीं न देखा, फिर शहसवार ख़ां का।
झप्पान, मेग, डम्बर दर पर हुआ तो फिर क्या?

कहता था कोई ड्योढ़ी, है ख़ान मेहेरबां की।
यह बाग यह हवेली, है महल दार ख़ां की।
जब राज ने क़ज़ा के करनी वसूली टांकी।
एक ईंट भी न पाई, हरगिज़ किसी मकां की।
रंगों महल, सुनहरा घर, दर हुआ, तो फिर क्या?

कितनों ने बादशाही, क्या क्या खि़ताब पाया।
मोहरें बड़ी खुदाई, सिक्का बड़ा बनाया।
जब आन कर फ़ना ने, नामों निशां मिटाया।
वह नाम और वह सिक्का, ढूंढ़ा कहीं न पाया।
दो दिन का मुहर, छापा, दर पर हुआ, तो फिर क्या?

जागीर में किसी ने, ज़र खेज़ मुल्क पाया।
कर बन्दोबस्त अपना, नज़्मो नसक़ बिठाया।
लेकर सनद, अजल की जब फ़ौजदार आया।
एक दिन में हुक्मों हासिल, सब हो गया पराया।
हांसी हिसार, ठट्टा, भक्कर हुआ तो फिर क्या?

कहता कोई यह लश्कर, है तुर्रे बाज़ ख़ां का।
यह ख़ेमा शामियाना, है शहनवाज़ ख़ां का।
आया कटक अजल के, जब यक्का ताज़ ख़ां का।
सर भी कहीं न पाया, फिर सरफ़राज ख़ां का।
सरदार, मीर, बख़्शी बढ़कर हुआ तो फिर क्या?

हाथी पे चढ़के निकले या ख़ासे घोड़े ऊपर।
या नालकी संभाली, या पालकी की झालर।
या ले सुराही, हुक्का दौड़े जलीब अन्दर।
जब आ अजल पुकारी, साहब रहा न नौकर।
आक़ा हुआ तो फिर क्या? नौकर हुआ तो फिर क्या?

या लेके एक क़लम दां और रख क़लम को सर पर।
जोड़े हिसाब लाखों, चेहरे लिखे सरासर।
जब उम्र की कचहरी, झांकी क़जा ने आकर।
फिर आप न क़लम दां, कागज़ रहा न दफ़्तर।
मुंशी, वकील, दीवां मर मर हुआ, तो फिर क्या?

या ले क़ज़ाकी खि़दमत, हो बैठे आप क़ाजी।
मेहज़र क़बाले लिखे, क़जिये चुकाये शरई।
ऐलान ले कज़ा का, जब आ फ़ना पुकारी।
फिर महकमा न झंगड़ा, क़ाजी रहा न मुफ़्ती।
कोड़ा लबेदा, दुर्रा दर पर हुआ, तो फिर क्या?

कुतवाल बनके बैठा, या सदर हो मुक़र्रर।
फ़ासिक डरें हज़ारों, और चोर कांपे थर थर।
आया क़जा का मरधा, जिस दम छुरी उठाकर।
कुतवाली और सदारत, सब उड़ गई हवा पर।
दो दिन का ख़ोफ़ो ख़तरा, और डर हुआ, तो फिर क्या?

कहते थे कितने हम तो हैं, जात में कलाँ जी।
हम शेख़, हम मुग़ल हैं, हम हैं पठान हां जी।
जिस दम क़ज़ा पुकारी, ‘अब उठ चलो मियां जी’।
फिर शेख़ जी न सैय्यद, मिर्जा रहे न ख़ां जी।
ज़ातो हस्ब नस्ब का, जौहर हुआ तो फिर क्या?

या लेके ज़र जहां में, करने लगे तिजारत।
या सेठ बनके बैठे, ख़ासी बना इमारत।
खोली क़ज़ा ने बहियाँ, जब करके इक इशारत।
सब कोठी और दुकानें, कर डालीं दम में ग़ारत।
मालो मकां, जवाहर, और ज़र हुआ तो फिर क्या?

या हो सिपाही बांका, तिरछा बड़ा कहाया।
बल दार बांध चीरा, तुर्रे को जगमगाया।
खेतों में जाके कूदा, लाखों तई भगाया।
जब मुंह अजल का देखा, फिर कुछ भी बन न आया।
यक्ता शुजा, बहादुर, सफ़दर हुआ तो फिर क्या?

घोड़ा उठा के डूबा फ़ौजों में हो दिलावर।
मारे तमंचे, भाले, खाई कटार, जमघर।
मारा क़ज़ा ने भाला, जिस दम फ़ना का आकर।
फिर मरदमी शुजाअत, सब हो गई बराबर।
खोद व कुलाह, चलता, बक्तर हुआ, तो फिर क्या?

या हो हकीम हाजिक़, करने लगे तबाबत।
मुर्दों तई जिलाया, ईसा की कर करामत।
खोये मरज हज़ारों, धोई हर एक जहमत।
जब आई सर पर अपने, फिर कुछ चली न हिकमत।
लुक़मान या फ़लातूं आकर हुआ, तो फिर क्या?

या हो नुजूमी कामिल, तारों को छान डाला।
सूरज गहन विचारे, चन्दर गहन निकाला।
बुर्ज़ो सितारे बांधे, अहकाम को संभाला।
जब वक्त अपना आया, उस वक्त को न टाला।
जोतिश, नुजूम, पण्डित, पढ़कर हुआ तो फिर क्या?

या पढ़के दो किताबें और करके इल्म हासिल।
या भूत, जिन उतारे, मशहूर होके आमिल।
जब देव का अजल के, साया हुआ मुकाबिल।
मुल्ला रहा न स्याना आलिम रहा न फ़ाजिल।
तावीज, फ़ाल, जादू, मंतर हुआ, तो फिर क्या?

माथे पे खीच टीका, या हाथ लेके माला।
पोथी बग़ल में दाबी, जुन्नार को संभाला।
पूजा कथा बखानी, गीता सबद निकाला।
कुछ बन सका न, आया जब जान लेने वाला।
वेदों पुरान पढ़कर मिस्सर हुआ तो फिर क्या?

या पीके मै किसी ने, की ऐशो कामयाबी।
लोटा नशे में हरजा कर दिल से बे हिजाबी।
जिस दम क़जा ने अपनी, झमकाई एक गुलाबी।
फिर मैं रही न मीना, न मस्त न शराबी।
एक दम लबों पे भभका, सागर हुआ तो फिर क्या?

हुस्नो जमाल पाकर, या खूबरू कहाया।
या इश्क में किसी ने, जी जान को घटाया।
आकर पड़ा सरों पर, जिस दम अजल का साया।
दीनों में फिर किसी को ढूंढ़ा कहीं न पाया।
आशिक़ हुआ तो फिर क्या? दिलबर हुआ तो फिर क्या?

या होके पीर जादे, करने लगे फ़कीरी।
करके मुरीद कितने, की उनकी दस्तगीरी।
जब पेरहन की कफ़नी, आकर अजल ने चीरी।
सब उड़ गई हवा पर, दम में मुरीदी पीरी।
मुर्शिद, हादी, रहबर हुआ तो फिर क्या?

या सर मुंडा के बैठे, आजाद हो नवेले।
या खुड़मुड़े कहाकर सौ रूप रंग खेले।
मेले किये हज़ारों मूंडे, फ़कीर चेले।
जब आ फ़ना पुकारी, जा सो रहे अकेले।
तकिया हुआ तो फिर क्या, बिस्तर हुआ तो फिर क्या?

जोगी, अतीत, जंगम या सेवड़ा कहाया।
या खोल कर जटा को, या घोंट सर मुंडाया।
त्रिसूल ले क़ज़ा का, जब वक्त सर पर आया।
ने वालके को थामा, ने आपको बचाया।
नानक कबीर पंथी, भरथर हुआ, तो फिर क्या?

या नेक बन के बैठे, अच्छे लगे कहाने।
या होके बद हर एक के, दिल को लगे सताने।
आकर बजे अजल के, जब सर पे शादयाने।
थे नेको बद जहां तक, सब लग गए ठिकाने।
बेहतर हुआ तो फिर क्या? बदतर हुआ तो फिर क्या?

क्या हिन्दू, क्या मुसलमाँ, क्या रिंदो गवरो काफ़िर।
नक़्क़ाश क्या मुसव्विर, क्या खुश नवीस शायिर।
जितने, ‘नज़ीर’ हैं, यां, एक दम के हैं मुसाफिर।
रहना नहीं किसी को चलना है सबको आखि़र।
दो चार दिन की ख़ातिर, यां घर हुआ तो फिर क्या?

 

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