दुख विचि जमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

दुख विचि जमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

दुख विचि जमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि ॥
दुखु दुखु अगै आखीऐ पड़्हि पड़्हि करहि पुकार ॥
दुख कीआ पंडा खुल्हीआ सुखु न निकलिओ कोइ ॥
दुख विचि जीउ जलाइआ दुखीआ चलिआ रोइ ॥
नानक सिफती रतिआ मनु तनु हरिआ होइ ॥
दुख कीआ अगी मारीअहि भी दुखु दारू होइ ॥१॥1240)॥

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