दुख के दिन-आसावरी-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

दुख के दिन-आसावरी-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

1.
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

मधु का स्वाद लिया है तो विष का भी स्वाद बताना होगा,
खेला है फूलों से तो शूलों को भी अपनाना होगा,
कलियों के रेशमी कपोलों को तूने चूमा है तो फिर
अंगारों को भी अधरों यर धर कर रे ! मुस्काना होगा,
जीवन का पथ ही कुछ ऐसा जिस पर धूप-छाँह संग रहतीं
सुख के मधुर क्षणों के संग ही बढ़ता है हर दु:ख का क्षण भी ।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

2.
गहन कुहू की अंधियारी में कब तारों को छवि मुरझाई ?
कोटों के कटु अंचल में कब कलि की सुन्दरता अकुलाई ?
बन्द हुई कब पपीहे की ‘पी’ वज्र बिजलियों के पतझड़ में,
सरिता की चल चंचलता कब सागर के सन्मुख शरमाई ?
तू फिर क्यों खो बैठा साहस देख घिरा सिर पर दुख-बादल
और भुला बैठा क्यों तुझमें शेष अभी जीवन, यौवन भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

3.
शूलों का अस्तित्व जहाँ है फूल वहीं तो मुस्काता है,
जहाँ अँधेरे की सत्ता है, जुगनू वहीं चमक पाता है ।
जीवन पूर्ण नहीं है पाकर केवल कुछ सुख के ही मृदु क्षण
सुख भी तो सुख कहलाता तब जीवन में जब दुख आता है,
इस पल जो कुछ है सन्मुख वरदान समझ उसको मेरे मन !
और देख फिर खोजेगा सुख तेरे दुख की छाँह-शरण ही
सुख के दिन सपने थे केवल सत्य मनुज ये दुख के दिन ही ।

4.
सुख के दिवस दिए थे जिसने देन उसी की ये दुख के दिन
जिस घट से छलकी थी मदिरा, शेष उसी घट के ये विषकण
यह अचरज की बात न कोई, सीधा-सादा खेल प्रकृति का
मधु ऋतु से विक्रय पतझर का सदा किया करता है मधुवन
यह क्रम निश्चित इसे न कोई बदल सका है, बदल सकेगा,
इससे ही तो कहता हूँ हैं व्यर्थ अश्रु औ’ व्यर्थ रुदन भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

5.
मुस्काता ही रहा सदा तो मुश्किल भी हल हो जाएगी,
रुके अश्रु-सी थकी ज़िन्दगी, तूफानों की गति पाएगी,
पथ की ऊंचाई, नीचाई जिसे देखकर डरता है मन
क्षण-भर में तेरे पग से, रुँद-रुँद कर समतल हो जाएगी,
दुख के सम्मुख मुस्काने से दुख ही, सुख लगने लगता है,
बन जाता विश्वास विजय का थका पड़ा मुरदा-सा मन भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

6.
हँसकर या रोकर तय कर, तय करना है तुझको ही यह मग,
तुझ पर हँसने का अवसर वह ताक रहा है छिप-छिप कर जग,
लक्ष्य-प्राप्ति से पूर्व कहीं जो रुका याद रख, जग के संग-संग
तुझ पर खूब हँसेंगे तुझको प्यार सदा करने वाले दृग,
और पंथ पर चलते-चलते ही यदि पथ की धूल बना तो
तेरी ख़ाक देख शरमाएगा युग-मस्तक का चन्दन भी ।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

7.
साँझ सूर्य की सांध्य-किरन जो तम की चादर में खो जाती,
वही प्रात ऊषा बन कर फिर तम के घूँघट से मुस्काती
तम से दूर ज्योति जीवन की ज्योतिहीन है तम सी ही है,
क्योंकि बुझी-सी ही जलती है दिन में दीपक की हर बाती,
माना यह प्रकाश जीबन में भरता है युग-दिन की हलचल,
किन्तु थके मन को देता विश्राम निशा का सूनापन ही।
सुख के दिन सपने थे केवल सत्य मनुज ये दुख के दिन ही ।

8.
सुख में थी आसान ज़िन्दगी इससे उसकी याद सताती,
दुख में कठिन बना है जीबन इसीलिए पीड़ा अकुलाती,
किन्तु याद रख, एक समय है जब अभाव खलता है दुख का,
और खोजने पर भी पीड़ा छाँह न तब दुख की छू पाती,
जीवन का वह निर्मम क्षण यदि आज नहीं तो कल आएगा,
सँभल मनुज ओ ! तुझे छल रहा प्रति पल तेरा मन दुश्मन ही ।
सुख के दिन सपने थे केवल सत्य मनुज ये दुख के दिन ही ।

9.
सुख का ऋण तो चुका दिया है तूने लेकर ये दुख के क्षण,
किन्तु शेष है अभी चुकाना सबसे अधिक कठिन दुख का ऋण,
कुछ ले देकर नहीं, किन्तु यह दुख का ऋण चुकता है ऐसे-
अधरों पर मुस्कान सजी हो नयनों से झरते हों जल-कण,
जो हँसकर मुस्काकर दुख का यह ऋण कठिन चुका लेता है,
हार मान लेते हैं उससे सुख-दुख जीवन और मरण भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

10.
कल नभ पर छाई थी ऐसी सघन घनों की काली चादर,
ऐसा लगता था न कभी फिर मुस्का पाएगा शशि सुन्दर,
किन्तु आज ही उस तम का है नाम निशाँ तक शेष न जग में,
जड़ा खड़ा तारक-मजियो से जगमग-जगमग करता अम्बर,
अचरज का मेला है यह जग कभी अंधेरा कभी उजेरा,
मधु में यहाँ छिपा रहता है काल-हलाहल का क्रन्दन भी ।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

11.
टूटे वे सपने ही जब लख जिन्हें अमरता थी शरमाई,
सूखा वह मधु ही जब जिसके सम्मुख अमर तृषा सकुचाई,
छूट गए वे साथी ही जिनके नयनों की स्नेह-छाँह में-
रोती-सी ज़िन्दगी फूल की मुस्कानें भर कर मुस्काई,
दे न सके जब साथ पंथ पर वे अमरत्व-शिला के पुतले,
फिर रे ! कब तक घिरा रहेगा जीवन के नभ पर दुख-क्षण भी ।
रहे न जब सूख के ही दिन तो कट जाएँगे दुख के दिन भी।

8-9-1947

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