दुआ- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

दुआ- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

सुनते ही मैंने कहा, शायद शहद की मक्खी भिनभिना रही है।
बे-यक़ीन दिल ने कहा, नहीं दूर कोई कच्चे सुरों में बीन
बजा रहा है।

खिड़की खुली थी…थोड़ी-सी।
बहुत ही तंग आँगन, ठिठुरी हुई ज़मीन
कि जिसमें धूप से कभी भी मेरी मुलाक़ात नहीं हुई
उसी आँगन में
मिट्टी की बनी कच्ची निराश दीवार के पार
देखा मैंने रौशनी की उस मासूम किरण को
जिसे ‘जिगर’ कह कर बुलाना, बाप कहलाने के लिए काफ़ी नहीं।
क़लम लगा रही थी ज़मीन में। बिना किसी खटके के।
(मुझे ऊपर से सेब की टहनी लगी)
…लगा रही थी…और जैसे
लगाते-लगाते गूँगों को बोलना सिखा रही थी।
बाग़ में दाखिल होते हुए मैंने
चम्बेली की जड़ों के ऊपर
खुरच-खोद कर मिट्टी डाल दी

बेख़बरी में, मैंने दुआ माँगी…!

 

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