दुआपर जुग बीतत भए कलिजुग के सिर छत्र फिराई ॥-बाबे नानक देव जी दी वार-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji 

दुआपर जुग बीतत भए कलिजुग के सिर छत्र फिराई ॥-बाबे नानक देव जी दी वार-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

दुआपर जुग बीतत भए कलिजुग के सिर छत्र फिराई ॥
बेद अथरबन थाप्या उतर्र मुख गुरमुख गुनगाई ॥
कपल रिखीशर सांख मथ अथरबन बेद की रिचा सुनाई ॥
ग्यानी महारस पिय कै सिमरै नित अनित न्याई ॥
ग्यान बिना नह पाईऐ जे कई कोट जतन कर धाई ॥
करम जोग देही करे सो अनित खिन टिकै न राई ॥
ग्यान मते सुख ऊपजै जनम मरन का भरम चुकाई ॥
गुरमुख ग्यानी सहज समाई ॥12॥

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