दीवाली चौपदे -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

दीवाली चौपदे -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

चमकते तारे लाई हो,
फूल से सजकर आई हो;
देख लूँ क्यों न आँख-भर मैं,
साल-भर पर दिखलाई हो।

ओस के कण किरणों को ले,
गये मोती से हैं तोले;
दिशाएँ उजली हैं हो गयी,
फूल हँसते हैं मुँह खोले।

धुल गया-सा है सारा थल,
विमल बनकर बहता है जल;
लुभा लेता है कानों को
थिरकती नदियों का कलकल।

बिछी सर में सुथरी चादर
दूध की धारों में धुलकर;
फबन फैली दिखलाती है
पेड़ पर, पत्तों फूलों पर।

चमकती चाँदी की-सी है,
सब जगह ज्योति जगी-सी है;
ताल की उठती लहरों में
सुपेदी उफनाती-सी है।

समय का यह सुहावनापन
देखने आई हो बन-ठन;
या किसी अलबेले पर तुम
रही हो वार फबीलापन।

दिये लाखों बल जाएँगे,
दमकते नगर दिखाएँगे;
जगमगाएँगे सारे पुर,
गाँव सब ज्योति जगाएँगे।

बड़ी सुंदर, नीली, न्यारी
सँवारी सुथरी जरतारी;
सजाई हीरों से होगी
रात की चमकीली सारी।

उजाला घर-घर पसरेगा
अंधेरापन भी निखरेगा;
अमावस पूनो होवेगी,
चाँद धरती पर उतरेगा।

समा दिखलाओगी आला,
भरोगी चावों का प्याला;
दिवाली, क्या न दूर होगा
देश में छाया अंधियाला।

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