दीवार पर लिखा पढ़ो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

दीवार पर लिखा पढ़ो-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

शब्दों में जान हो तो
वह स्वयं ही
छलाँग मार दीवार पर जा चढ़ते हैं।
बिना सीढ़ी जा बैठते हैं नंगे धड़।

राहगीरों को स्वयं ही
संदेशे बाँटे जाते हैं।
कहें! ओ जाते राहियों
हमारा सँदेशा देना अपने आप को।
सुनना अकेले बैठ कर।
किताबों की गैरहाज़िरी में
कब्रें बन जाता है मन।

बेटियों के बगैर समतल हो जाते हैं
घर के द्वार दीवार।
खाली घरों में जाले।
किताबों, बेटियों वाले घर सुलक्षण भाग्यों वाले।

शब्दों की फ़ाख़्ताओं के बगैर
मर जाती है मासूमियत
बेटियों के बगैर आँगन में
न लोरियाँ न वैवाहिक गीत।
विवाह में गाई जाने वाली गालियों
और सुहाग गीत बगैर
उजड़ जाता है मन का बाग।
बुझ जाते हैं मन मंदिर के चिराग।

न गिद्धे की धमक न रिश्तों की चमक।
सब कुछ बदरंग हो जाता है बेटियों के बगैर।
झूले तरसते हैं
सूरज को हाथ लगा कर लौटने वाली
चंचलता को बेकरार।

करके शृंगार खड़ी बसंत ऋतु
पूछती फिरती है महक का पता।
बेटियों के बगैर बहुत कुछ बेस्वाद-सा।
प्लास्टिक के फूलों की तरह निर्जीव बेजान।

दीवार पर बैठी कविता को सुनो
घरों दरों को कविता चाहिए है।
महकती साँस के लिए
सुरक्षित विश्वास के लिए।
आज की सलामती और
कल के इतिहास के लिए।

दीवारें बोलती हैं जब
तब सुना करो।
वक्त अब
घड़ियों में बैठा किसी का गुलाम नहीं।
चौक में आ खड़ा है सावधान।
ललकार कर बोलता है
किताबें और लड़कियाँ प्यारिए
सपनों और बेटियों को कोख में न मारिए।

 

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