दीपिका पादुकोण के JNU के जख्मियों को मिलने पर-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

दीपिका पादुकोण के JNU के जख्मियों को मिलने पर-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

अगर तुम
सिनेमा स्क्रीन से उतर
हक़ सच इंसाफ़ के लिए लड़ती
बंगाल की बेटी ‘आईशी घोष’ का
यूनिवर्सिटी जाकर
ज़ख़्मी माथा नहीं चूमती
तो मुझे भ्रम रह जाता
कि माँ-बाप द्वारा रखे नाम
निरर्थक होते हैं।
दीपिका!
जलती लौ जैसी!
तुम सच में प्रकाश पुत्री हो।
तुम्हारा निहत्थे बच्चों के पास जाना
हमदर्द बन उठाना-बैठना
उस विश्वास की झलक है
जो कहीं खो रहा है दिन-बदिन
ऐसा लगा!
मंडी में सबकुछ बिकाऊ नहीं।
सर्दियों के दिन हैं
बाजारों में मूंगफली के ढेर लगे हैं
धड़ा-धड़ तुलते बिकते।
हे महंगे बादामों सी बेटी!
मंडी का माल न बनने का शुक्रिया।

‘आईशी घोष’ के माथे के ज़ख्म
तुम्हारे चूमते ही सूखने लगे हैं।
अनकहा नारा अंबर तक
गूंज उठा है चहुँ ओर।
“त्रिशूलों, तलवारों, चाकुओं
के जमघट में घिरे
हम अकेले नहीं हैं।
बहुत लोग हैं।
अकेले नहीं हैं जंगल में।”

 

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