दीपशिखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Deepshikha Part 1

दीपशिखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Deepshikha Part 1

दीप मेरे जल अकम्पित

दीप मेरे जल अकम्पित,
घुल अचंचल!
सिन्धु का उच्छवास घन है,
तड़ित, तम का विकल मन है,
भीति क्या नभ है व्यथा का
आँसुओं से सिक्त अंचल!
स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,
मीड़, सब भू की शिरायें,
गा रहे आंधी-प्रलय
तेरे लिये ही आज मंगल

मोह क्या निशि के वरों का,
शलभ के झुलसे परों का
साथ अक्षय ज्वाल का
तू ले चला अनमोल सम्बल!

पथ न भूले, एक पग भी,
घर न खोये, लघु विहग भी,
स्निग्ध लौ की तूलिका से
आँक सबकी छाँह उज्ज्वल

हो लिये सब साथ अपने,
मृदुल आहटहीन सपने,
तू इन्हें पाथेय बिन, चिर
प्यास के मरु में न खो, चल!

धूम में अब बोलना क्या,
क्षार में अब तोलना क्या!
प्रात हंस रोकर गिनेगा,
स्वर्ण कितने हो चुके पल!
दीप रे तू गल अकम्पित,
चल अंचल!

सब बुझे दीपक जला लूँ !

सब बुझे दीपक जला लूं
घिर रहा तम आज दीपक रागिनी जगा लूं

क्षितिज कारा तोडकर अब
गा उठी उन्मत आंधी,
अब घटाओं में न रुकती
लास तन्मय तडित बांधी,
धूल की इस वीणा पर मैं तार हर त्रण का मिला लूं!

भीत तारक मूंदते द्रग
भ्रान्त मारुत पथ न पाता,
छोड उल्का अंक नभ में
ध्वंस आता हरहराता
उंगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचा लूं!

लय बनी मृदु वर्तिका
हर स्वर बना बन लौ सजीली,
फैलती आलोक सी
झंकार मेरी स्नेह गीली
इस मरण के पर्व को मैं आज दीवाली बना लूं!

देखकर कोमल व्यथा को
आंसुओं के सजल रथ में,
मोम सी सांधे बिछा दीं
थीं इसी अंगार पथ में
स्वर्ण हैं वे मत कहो अब क्षार में उनको सुला लूं!

अब तरी पतवार लाकर
तुम दिखा मत पार देना,
आज गर्जन में मुझे बस
एक बार पुकार लेना
ज्वार की तरिणी बना मैं इस प्रलय को पार पा लूं!
आज दीपक राग गा लूं!

तरल मोती से नयन भरे

तरल मोती से नयन भरे!

मानस से ले, उटे स्नेह-घन,
कसक-विद्यु पुलकों के हिमकण,
सुधि-स्वामी की छाँह पलक की सीपी में उतरे!

सित दृग हुए क्षीर लहरी से,
तारे मरकत-नील-तरी से,
सुखे पुलिनों सी वरुणी से फेनिल फूल झरे!

पारद से अनबींधे मोती,
साँस इन्हें बिन तार पिरोती,
जग के चिर श्रृंगार हुए, जब रजकण में बिखरे!

क्षार हुए, दुख में मधु भरने,
तपे, प्यास का आतप हरने,
इनसे घुल कर धूल भरे सपने उजले निखरे!

जो न प्रिय पहिचान पाती

जो न प्रिय पहिचान पाती।

दौड़ती क्यों प्रति शिरा में प्यास विद्युत-सी तरल बन
क्यों अचेतन रोम पाते चिर व्यथामय सजग जीवन?
किसलिये हर साँस तम में
सजल दीपक राग गाती?

चांदनी के बादलों से स्वप्न फिर-फिर घेरते क्यों?
मदिर सौरभ से सने क्षण दिवस-रात बिखेरते क्यों?
सजग स्मित क्यों चितवनों के
सुप्त प्रहरी को जगाती?

मेघ-पथ में चिह्न विद्युत के गये जो छोड़ प्रिय-पद,
जो न उनकी चाप का मैं जानती सन्देश उन्मद,
किसलिये पावस नयन में
प्राण में चातक बसाती?

कल्प-युगव्यापी विरह को एक सिहरन में सँभाले,
शून्यता भर तरल मोती से मधुर सुधि-दीप बाले,
क्यों किसी के आगमन के
शकुन स्पन्दन में मनाती?

मिट चली घटा अधीर!

मिट चली घटा अधीर!

चितवन तम-श्याम रंग,
इन्द्रधनुष भृकुटि-भंग,
विद्युत् का अंगराग,
दीपित मृदु अंग-अंग,
उड़ता नभ में अछोर तेरा नव नील चीर!

अविरत गायक विहंग,
लास-निरत किरण संग,
पग-पग पर उठते बज,
चापों में जलतरंग,
आई किसकी पुकार लय का आवरण चीर!

थम गया मदिर विलास,
सुख का वह दीप्त हास,
टूटे सब वलय-हार,
व्यस्त चीर अलक पाश,
बिंध गया अजान आज किसका मृदु-कठिन तीर?

छाया में सजल रात
जुगुनू में स्वप्न-व्रात,
लेकर, नव अन्तरिक्ष;
बुनती निश्वास वात,
विगलित हर रोम हुआ रज से सुन नीर नीर!

प्यासे का जान ग्राम,
झुलसे का पूछ नाम,
धरती के चरणों पर
नभ के धर शत प्रणाम,
गल गया तुषार-भार बन कर वह छवि-शरीर!

रूपों के जग अनन्त,
रँग रस के चिर बसन्त,
बन कर साकार हुआ,
तेरा वह अमर अन्त,
भू का निर्वाण हुई तेरी वह करुण पीर!
घुल गई घटा अधीर!

सब आँखों के आँसू उजले

सब आँखों के आँसू उजले
सबके सपनों में सत्‍य पला!

जिसने उसको ज्‍वाला सौंपी
उसने इसमें मकरंद भरा,
आलोक लुटाता वह घुल-घुल
देता झर यह सौरभ बिखरा!

दोनों संगी, पथ एक, किंतु
कब दीप खिला कब फूल जला?

वह अचल धरा को भेंट रहा
शत-शत निर्झर में हो चंचल,
चिर परिधि बन भू को घेरे
इसका उर्मिल नित करूणा-जल

कब सागर उर पाषाण हुआ,
कब गिरि ने निर्मम तन बदला?

नभ तारक-सा खंडित पुलकित
यह क्षुद्र-धारा को चूम रहा,
वह अंगारों का मधु-रस पी
केशर-किरणों-सा झूम रहा,

अनमोल बना रहने को
कब टूटा कंचन हीरक पिघला?

नीलम मरकत के संपुट दो
जिसमें बनता जीवन-मोती,
इसमें ढलते सब रंग-रुप
उसकी आभा स्‍पंदन होती!

जो नभ में विद्युत-मेघ बना
वह रज में अंकुर हो निकला!

संसृति के प्रति पग में मेरी
साँसों का नव अंकन चुन लो,
मेरे बनने-मिटने में नित
अपने साधों के क्षण गिन लो!

जलते खिलते जग में
घुलमिल एकाकी प्राण चला!

सपने सपने में सत्‍य ढला!

सपने जगाती आ!

श्याम अंचल,
स्नेह-उर्म्मिल,
तारकों से चित्र-उज्ज्वल,
घिर घटा-सी चाप से पुलकें उठाती आ!
हर पल खिलाती आ!

सजल लोचन,
तरल चितवन,
सरल भ्रू पर विरल श्रम-कण,
तृषित भू को क्षीर-फेनिल स्मित पिलाती आ!
कण-तृण जिलाती आ!

शूल सहते,
फूल रहते;
मौन में निज हार कहते,
अश्रु-अक्षर में पता जय का बताती आ!
हँसना सिखाती आ!

विकल नभ उर,
घूलि-जर्जर
कर गये हैं दिवस के शर,
स्निग्ध छाया से सभी छाले धुलाती आ!
क्रन्दन सुलाती आ!

लय लुटी है,
गति मिटी है,
हाट किरणों की बटी है,
धीर पग से अमर क्रम-गाथा सुनाती आ!
भूलें भुलाती आ!

व्योम में खग,
पंथ में पग,
उलझनों में खो चला जग,
लघु निलय में नींद के सबको मिलाती आ!
दूरी मिटाती आ!

कर व्यथायें,
सुख-कथायें,
तोड़ सीमा की प्रथायें,
प्रात के अभिषेक को हर दृग सजाती आ!
उर-उर बसाती आ!
सपने जगाती आ!

क्यों अश्रु न हों श्रृंगार मुझे!

क्यों अश्रु न हों श्रृंगार मुझे!

रंगों के बादल निरतरंग,
रूपों के शत-शत वीचि-भंग,
किरणों की रेखाओं में भर,
अपने अनन्त मानस पट पर,
तुम देते रहते हो प्रतिपल, जाने कितने आकार मुझे!
हर छबि में कर साकार मुझे!

मेरी मृदु पलकें मूँद-मूँद,
छलका आँसू की बूँद-बूँद,
लघुत्तम कलियों में नाप प्राण,
सौरभ पर मेरे तोल गान,
बिन माँगे तुमने दे डाला, करुणा का पारावार मुझे!
चिर सुख-दुख के दो पार मुझे!

लघु हृदय तुम्हारा अमर छन्द,
स्पन्दन में स्वर-लहरी अमन्द,
हर स्नेह का चिर निबन्ध,
हर पुलक तुम्हारा भाव-बन्ध,
निज साँस तुम्हारी रचना का लगती अखंड विस्तार मुझे!
हर पल रस का संसार मुझे!

मैं चली कथा का क्षण लेकर,
मैं मिली व्यथा का कण देकर,
इसको नभ ने अवकाश दिया,
भू ने इसको इतिहास किया,
अब अणु-अणु सौंपे देता है, युग-युग का संचित प्यार मुझे!
कह-कह पाहुन सुकुमार मुझे!

रोके मुझको जीवन अधीर,
दृग-ओट न करती सजग पीर,
नुपुर से शत-शत मिलन-पाश
मुखरित, चरणों के आस-पास,
हर पग पर स्वर्ग बसा देती धरती की नव मनुहार मुझे!
लय में अविराम पुकार मुझे!
क्यों अश्रु न हो श्रृंगार मुझे!

तम में बनकर दीप-आँसू से धो आज

आँसू से धो आज इन्हीं अभिशापों को वर कर जाऊँगी !

शूलों से हो गात दुकेला,
तुहिन-भार-नत प्राण अकेला,
कण भर मधु ले, जीवन ने
हो निशि का तम दिन आतप झेला;
सुरभित साँसे बाँट तुम्हारे पथ में हंस-हंस बिछ जाऊँगी !

चाहो तो दृग स्नेह-तरल दो,
वर्ती से नि:श्वास विकल दो,
झंझा पर हँसने वाले
उर में भर दीपक की झिलमिल दो !
तम में बनकर दीप, सवेरा आंखों में भर बुझ जाऊँगी !

निमिषों में संसार ढला है,
ज्वाला में उर-फूल पला है,
मिट-मिटकर नित मूल्य चुकाने-
को सपनों का भार मिला है!
जग की रेखा-रेखा में सुख-दुख का स्पन्दन भर जाऊँगी !

तुम्हारी बीन ही में बज रहे हैं बेसुरे सब तार

तुम्हारी बीन ही में बज रहे हैं बेसुरे सब तार !

मेरी सांस में आरोह,
उर अवरोह का संचार,
प्राणों में रही घिर घूमती चिर मूर्च्छना सुकुमार !

चितवन ज्वलित दीपक-गान,
दृग में सजल मेघ-मलार;
अभिनव मधुर उज्जवल स्वप्न शत-शत राग के श्रृंगार !

सम हर निमिष, प्रति पग ताल,
जीवन अमर स्वर-विस्तार,
मिटती लहरियों ने रच दिये कितने अमिट संसार !

तुम अपनी मिला लो बीन,
भर लो उँगलियों में प्यार,
घुल कर करुण लय में तरल विद्युत् की बहे झंकार !

फूलों से किरण की रेणु,
तारों से सुरभि का भार
बरस, चढ़ चले चौंके कणों से अजर मधु का ज्वार !

 मेरे ओ विहग-से गान

मेरे ओ विहग-से गान !

सो रहे उर-नीड़ में मृदु पंख सुख-दुख़ के समेटे,
सघन विस्मृति में उनींदी अलस पलकों को लपेटे,
तिमिर सागर से धुले,
दिशि-कूल से अनजान ।

खोजता तुमको कहाँ से आ गया आलोक–सपना?
चौंक तोले पंख तुमको याद आया कौन अपना?
कुहर में तुम उड़ चले
किम छांह को पहचान?

शून्य में यह साध-बोझिल पंख रचते रश्मि-रेखा,
गति तुम्हारी रंग गई परिचित रंगों से पथ अदेखा,
एक कम्पन कर रही
शत इन्द्रधनु निर्माण!

तर तम-जल में जिन्होंने ज्योति के बुद्बुद जगाये,
वे सजीले स्वर तुम्हारे क्षितिज सीमा बाँध आये,
हंस उठा अब अरुण शतदल-
सा ज्वलित दिनमान!

नभ, अपरिमित में भले हो पंथ का साथी सबेरा,
खोज का पर अन्त है यह तृण-कणों का लघु बसेरा,
तुम उड़ो ले धूलि का,
करुणा-सजल वरदान !

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