दीपशिखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Deepshikha Part 4

दीपशिखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Deepshikha Part 4

प्राण हँस कर ले चला जब

प्राण हँस कर ले चला जब
चिर व्यथा का भार!

उभर आये सिन्धु उर में
वीचियों के लेख,
गिरि कपोलों पर न सूखी
आँसुओं की रेख।
धूलि का नभ से न रुक पाया कसक-व्यापार!

शान्त दीपों में जगी नभ
की समाधि अनन्त,
बन गये प्रहरी, पहन
आलोक-तिमिर, दिगन्त!
किरण तारों पर हुए हिम-बिन्दु बन्दनवार।

स्वर्ण-शर से साध के
घन ने लिया उर बेध,
स्वप्न-विहगों को हुआ
यह क्षितिज मूक निषेध!
क्षण चले करने क्षणों का पुलक से श्रृंगार!

शून्य के निश्वास ने दी
तूलिका सी फर,
ज्वार शत शत रंग के
फैले धरा को घेर!
वात अणु अणु में समा रचने लगी विस्तार!

अब न लौटाने कहो
अभिशाप की वह पीर,
बन चुकी स्पन्दन ह्रदय में
वह नयन में नीर!
अमरता उसमें मनाती है मरण-त्योहार!

छाँह में उसकी गये आ
शूल फूल समीप,
ज्वाल का मोती सँभाले
मोम की यह सीप
सृजन के शत दीप थामे प्रलय दीपाधार!

यह सपने सुकुमार

यह सपने सुकुमार तुम्हारी स्मित से उजले!

कर मेरे सजल दृगों की मधुर कहानी,
इनका हर कण हुआ अमर करुणा वरदानी,
उडे़ तृणों की बात तारकों से कहने यह
चुन प्रभात के गीत, साँझ के रंग सलज ले!

लिये छाँह के साथ अश्रु का कुहक सलोना,
चले बसाने महाशून्य का कोना कोना,
इनकी गति में आज मरण बेसुध बन्दी है,
कौन क्षितिज का पाश इन्हें जो बाँध सहज ले।

पंथ माँगना इन्हें पाथेय न लेना,
उन्नत मूक असीम, मुखर सीमित तल देना,
बादल-सा उठ इन्हें उतरना है, जल-कण-सा,
नभ विद्युत् के बाण, सजा शूलों को रज ले!

जाते अक्षरहीन व्यथा की लेकर पाती,
लौटानी है इन्हें स्वर्ग से भू की थाती,
यह संचारी दीप, ओट इनको झंझा दे,
आगे बढ़, ले प्रलय, भेंट तम आज गरज ले!

छायापथ में अंक बिखर जावें इनके जब,
फूलों में खिल रूप निखर आवें इनके जब,
वर दो तब यह बाँध सकें सीमा से तुमको,
मिलन-विरह के निमिष-गुँथी साँसों की स्रज ले!

तू धूल-भरा ही आया

तू धूल-भरा ही आया!
ओ चंचल जीवन-बाल! मृत्यु जननी ने अंक लगाया!

साधों ने पथ के कण मदिरा से सींचे,
झंझा आँधी ने फिर-फिर आ दृग मींचे,
आलोक तिमिर ने क्षण का कुहक बिछाया!

अंगार-खिलौनों का था मन अनुरागी,
पर रोमों में हिम-जड़ित अवशता जागी,
शत-शत प्यासों की चली बुभाती छाया!

गाढे विषाद ने अंग कर दिये पंकिल,
बिंध गये पगों में शूल व्यथा के दुर्मिल,
कर क्षार साँस ने उर का स्वर्ण उड़ाया!

पाथेय-हीन जब सपने
आख्यानशेष रह गये अंक ही अपने,
तब उस अंचल ने दे संकेत बुलाया!

जिस दिन लौटा तू चकित थकित-सा उन्मन,
करुणा से उसके भर-भर आये लोचन,
चितवन छाया में दृग-जल से नहलाया!

पालकों पर घर-घर अगणित शीतल चुम्बन,
अपनी साँसों से पोंछ वेदना के क्षण,
हिम स्निग्ध करों से बेसुध प्राण सुलाया!

नूतन प्रभात में अक्षय यति का वर दे,
तन सजल घटा-सा तड़ित-छटा-सा उर दे
हँस तुझे खेलने फिर जग में पहुँचाया!

तू धूल भरा जब आया,
ओ चंचल जीवन-बाल मृत्यु-जननी ने अंक लगाया!

झिप चलीं पलकें तुम्हारी पर कथा है शेष!

झिप चलीं पलकें तुम्हारी पर कथा है शेष!

अतल सागर के शयन से,
स्वप्न के मुक्ता-चयन से,
विकल कर तन,
चपल कर मन, किरण-अंगुलि का मुझे लाया बुला निर्देश!

वीचियों-सी पुलक-लहरी,
शून्य में बन कुहक ठहरी,
रँग चले दृग,
रच चले पग, श्यामले घन-द्वीप उजले बिजलियों के देश!

मौन जग की रागिनी थी,
व्यथित रज उन्मादिनी थी,
हो गये क्षण,
अग्नि के कण,
ज्वार ज्वाला का बना जब प्यास का उन्मेष!

स्निग्ध चितवन प्राणदा ले,
चिर मिलन हित चिर विदा ले,
हँस घुली मैं,
मिट चली मैं,
आँक उल्का अक्षरों में सब अतीत निमेष!

अमिट क्रम में नील-किसलय,
बाँध नव विद्रुम-सुमन-चय,
रेख-अर्चित,
रूप-चर्चित,
इन्द्रधनुषी कर दिया मैंने कणों का वेश!

अब धरा के गान ऊने,
मचलते हैं गगन छूने,
किरण-रथ दो,
सुरभि-पथ दो,
और कह दो अमर मेरा हो चुका सन्देश!

निमिष से मेरे विरह के कल्प बीते!

निमिष से मेरे विरह के कल्प बीते!

पंथ को निर्वाण माना,
शूल को वरदान जाना,
जानते यह चरण कण कण
छू मिलन-उत्सव मनाना!
प्यास ही से भर लिये अभिसार रीते!
ओस से ढुल कल्प बीते!

नीरदों में मन्द्र गति-स्वन,
वात में उर का प्रकम्पन,
विद्यु में पाया तुम्हारा
अश्रु से उजला निमन्त्रण!
छाँह तेरी जान तम को श्वास पीते!
फूल से खिल कल्प बीते!

माँग नींद अनन्त का वर,
कर तुम्हारे स्वप्न को चिर,
पुलक औ’ सुधि के पुलिन से
बाँध दुख का अगम सागर,
प्राण तुमसे हार कर प्रति बार जीते!
दीप से घुल कल्प बीते!

 

आज दे वरदान!

आज दे वरदान!
वेदने वह स्नेह-अँचल-छाँह का वरदान!

ज्वाल पारावार-सी है,
श्रृंखला पतवार-सी है,
बिखरती उर की तरी में
आज तो हर साँस बनती शत शिला के भार-सी है!
स्निग्ध चितवन में मिले सुख का पुलिन अनजान!

तूँबियाँ, दुख-भार जैसी,
खूँटियाँ अंगार जैसी,
ज्वलित जीवन-वीण में अब,
धूम-लेखायें उलझतीं उँगलियों से तार जैसी,
छू इसे फिर क्षार में भर करुण कोमल गान!

अब न कह ‘जग रिक्त है यह’
‘पंक ही से सिक्त है यह’
देख तो रज में अंचचल,
स्वर्ग का युवराज तेरे अश्रु से अभिसिक्त है यह!
अमिट घन-सा दे अखिल रस-रूपमय निर्वाण!

स्वप्न-संगी पंथ पर हो,
चाप का पाथेय भर हो,
तिमिर झंझावात ही में
खोजता इसको अमर गति कीकथा का एक स्वर हो!
यह प्रलय को भेंट कर अपना पता ले जान!
आज दे वरदान!

प्राणों ने कहा कब दूर,पग ने कब गिने थे शूल?

प्राणों ने कहा कब दूर,
पग ने कब गिने थे शूल?

मुझको ले चला जब भ्रान्त,
वह निश्वास ही का ज्वार,
मैंने हँस प्रलय से बाँध
तरिणी छोड़ दी मँझधार!
तुमसे पर न पूछा लौट,
अब होगा मिलन किस कूल?

शतधा उफन पारावार,
लेता जब दिशायें लील,
लाता खींच झंझावात,
तम के शैल कज्जल-नील,
तब संकेत अक्षरहीन,
पढ़ने में हुई कब भूल?
मेरे सार्थवाही स्वप्न
अंचल में व्यथा भरपूर,
आँखें मोतियों का देश
साँसें बिजलियों का चूर!
तुमसे ज्वाल में हो एक
मैंने भेंट ली यह धूल!

मेरे हर लहर में अंक
हर ण में पुलक के याम,
पल जो भेजते हो रिक्त
मधु भर बाँटती अविराम!
मेरी पर रही कब साध
जग होता तनिक अनुकूल?

भू की रागिनी में गूँज,
गर्जन में गगन को नाप,
क्षण में वार क्षण में पार
जाती जब चरण की चाप,
देती अश्रु का मैं अर्घ्य
घर चिनगारियों के फूल!

गूँजती क्यों प्राण-वंशी!

गूँजती क्यों प्राण-वंशी!

शून्यता तेरे हृदय की
आज किसकी साँस भरती?
प्यास को वरदान करती,
स्वर-लहरियों में बिखरती!
आज मूक अभाव किसने कर दिया लयवान वंशी?

अमिट मसि के अंक से
सूने कभी थे छिद्र तेरे,
पुलक अब हैं बसेरे,
मुखर रंगों के चितेरे,
आज ली इनकी व्यथा किन उँगलियों ने जान वंशी?

मृण्मयी तू रच रही यह
तरल विद्युत्-ज्वार-सा क्या?
चाँदनी घनसार-सा क्या?
दीपकों के हार-सा क्या?
स्वप्न क्यों अवरोह में, आरोह में दुखगान वंशी?
गूँजती क्यों प्राण-वंशी

तेरी छाया में अमिट रंग-बहना जलना

तेरी छाया में अमिट रंग,
तेरी ज्वाला में अमर गान !

जड़ नीलम-श्रृंगों का वितान
मरकत की क्रूर शिला धरती,
घेरे पाषाणी परिधि तुझे
क्या मृदु तन में कम्पन भरती?
यह जल न सके,
यह गल न सके,
यह मिट कर पग भर चल न सके!
तू माँग न इनसे पंथ-दान!

जिसमें न व्यथा से ज्वलित प्राण
यह अचल कठिन उन्नत सपना,
सुन प्रलय-घोष बिखरा देगा,
इसको दुर्बल कम्पन अपना !
ढह आयेंगे,
बह जायेंगे,
यह ध्वंस कथा दुहरायेंगे !
तू घुल कर बन रचना-विधान!

घिरते नभ-निधि-आवर्त्त-मेघ,
मसि-वातचक्र सी वात चली,
गर्जन-मृदंग हरहर-मंजीर,
पर गाती दुख बरसात भली !
कम्पन मचली,
साँसें बिछलीं
इनमें कौंधी गति की बिजली!
तू सार्थवाह बस इन्हें मान !

जिस किरणांगुलि ने स्वप्न भरे,
मृदुकर-सम्पुट में गोद लिया,
चितवन में ढाला अतल स्नेह,
नि:श्वासों का आमोद दिया,
कर से छोड़ा,
उर से जोड़ा,
इंगित से दिशि-दिशि में मोड़ा !
क्या याद न वह आता अजान ?

उस पार कुहर-धूमिल कर से,
उजला संकेत सदा झरता,
चल आज तमिस्रा के उर्म्मिल
छोरों में स्वर्ण तरल भरता,
उन्मद हँस तू,
मिट-मिट बस तू
चिनगारी का भी मधुरस तू!
तेरे क्षय में दिन की उड़ान !

जिसके स्पन्दन में बढ़ा ज्वार
छाया में मतवाली आँधी,
उसने अंगार-तरी तेरी
अलबेली लहरों से बाँधी !
मोती धरती,
विद्युत् भरती,
दोनों उस पग-ध्वनि पर तरतीं!
बहना जलना अब एक प्राण !

पूछता क्यों शेष कितनी रात

पूछता क्यों शेष कितनी रात?

छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तू
स्निग्ध सुधि जिनकी लिये कज्जल-दिशा में हँस चला तू
परिधि बन घेरे तुझे, वे उँगलियाँ अवदात!

झर गये ख्रद्योत सारे,
तिमिर-वात्याचक्र में सब पिस गये अनमोल तारे;
बुझ गई पवि के हृदय में काँपकर विद्युत-शिखा रे!
साथ तेरा चाहती एकाकिनी बरसात!

व्यंग्यमय है क्षितिज-घेरा
प्रश्नमय हर क्षण निठुर पूछता सा परिचय बसेरा;
आज उत्तर हो सभी का ज्वालवाही श्वास तेरा!
छीजता है इधर तू, उस ओर बढता प्रात!
प्रणय लौ की आरती ले
धूम लेखा स्वर्ण-अक्षत नील-कुमकुम वारती ले
मूक प्राणों में व्यथा की स्नेह-उज्ज्वल भारती ले
मिल, अरे बढ़ रहे यदि प्रलय झंझावात।

कौन भय की बात।
पूछता क्यों कितनी रात?

 घिरती रहे रात

घिरती रहे रात !

न पथ रून्धतीं ये
गगन तम शिलायें,
न गति रोक पातीं
पिघल मिल दिशायें;
चली मुक्त मैं ज्यों मलय की मधुर वात !
घिरती रहे रात !

न आंसू गिने औ’,
न कांटे संजोये,
न पग-चाप दिग्भ्रांत;
उच्छ्वास खोये;
मुझे भेंटता हर पलक-प्रात में प्रात !
घिरती रहे रात !

नयन ज्योति वह
यह हृदय का सबेरा,
अतल सत्य प्रिय का,
लहर स्वप्न मेरा,
कही चिर विरह ने मिलन की नई बात !
घिरती रहे रात !

स्वजन, स्वर्ण कैसा
न जो ज्वाल-धोया ?
हँसा कब तड़ित् में
न जो मेघ रोया ?
लिया साध ने तोल अंगार-संघात !
घिरती रहे रात !

जले दीप को
फूल का प्राण दे दो,
शिखा लय-भरी,
साँस को दान दे दो,
खिले अग्नि-पथ में सजल मुक्ति-जलजात !
घिरती रहे रात !

जग अपना भाता है

जग अपना भाता है !
मुझे प्रिय पथ अपना भाता है ।

……
नयनों ने उर को कब देखा,
हृदय न जाना दृग का लेखा,
आग एक में और दूसरा सागर ढुल जाता है !
धुला यह वह निखरा आता है !

और कहेंगे मुक्ति कहानी,
मैंने धूलि व्यथा भर जानी,
हर कण को छू प्राण पुलक-बंधन में बंध जाता है ।
मिलन उत्सव बन क्षण आता है !
मुझे प्रिय जग अपना भाता है !

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