दीपशिखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Deepshikha Part 2

दीपशिखा -महादेवी वर्मा-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mahadevi Verma Deepshikha Part 2

 पंथ होने दो अपरिचित

पंथ होने दो अपरिचित
प्राण रहने दो अकेला

और होंगे चरण हारे,
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;
दुखव्रती निर्माण-उन्मद
यह अमरता नापते पद;
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला

दूसरी होगी कहानी
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;
आज जिसपर प्यार विस्मृत ,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला

हास का मधु-दूत भेजो,
रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;
ले मिलेगा उर अचंचल
वेदना-जल स्वप्न-शतदल,
जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला

हुए शूल अक्षत

हुए शूल अक्षत मुझे धूलि चन्दन!

अगरु धूम-सी साँस सुधि-गन्ध-सुरभित,
बनी स्नेह-लौ आरती चिर-अकम्पित,
हुआ नयन का नीर अभिषेक-जल-कण!

सुनहले सजीले रँगीले धबीले,
हसित कंटकित अश्रु-मकरन्द-गीले,
बिखरते रहे स्वप्न के फूल अनगिन!

असित-श्वेत गन्धर्व जो सृष्टि लय के,
दृगों को पुरातन, अपरिचित ह्रदय के,
सजग यह पुजारी मिले रात औ’ दिन!

परिधिहीन रंगों भरा व्योम-मंदिर,
चरण-पीठ भू का व्यथा-सिक्त मृदु उर,
ध्वनित सिन्धु में है रजत-शंख का स्वन!

कहो मत प्रलय द्वार पर रोक लेगा,
वरद मैं मुझे कौन वरदान देगा?
हुआ कब सुरभि के लिये फूल बन्धन?

व्यथाप्राण हूँ नित्य सुख का पता मैं,
धुला ज्वाल से मोम का देवता मैं,
सृजन-श्वास हो क्यों गिनूँ नाश के क्षण!

विहंगम-मधुर स्वर तेरे

विहंगम-मधुर स्वर तेरे,
मदिर हर तार है मेरा!

रही लय रूप छलकाती
चली सुधि रंग ढुलकाती
तुझे पथ स्वर्ण रेखा, चित्रमय
संचार है मेरा!

तुझे पा बज उठे कण-कण
मुझे छू लासमय क्षण-क्षण!
किरण तेरा मिलन, झंकार-
सा अभिसार है मेरा!

धरा से व्योम का अन्तर,
रहे हम स्पन्दनों से भर,
निकट तृण नीड़ तेरा, धूलि का
आगारा है मेरा!

न कलरव मूल्य तू लेता,
ह्रदय साँसे लुटा देता,
सजा तू लहर-सा खग,
दीप-सा श्रृंगार है मेरा।

चुने तूने विरल तिनके
गिने मैंने तरल मनके,
तुझे व्यवसाय गति है,
प्राण का व्यापार है मेरा!

गगन का तू अमर किन्नर,
धरा का अजर गायक उर,
मुखर है शून्य तुझसे लय भरा
यह क्षार है मेरा।

उड़ा तू छंद बरसाता,
चला मन स्वप्न बिखराता,
अमिट छवि की परिधि तेरी,
अचल रस-पार है मेरा!

बिछी नभ में कथा झीनी,
घुली भू में व्यथा भीनी,
तड़ित उपहार तेरा, बादलों-
सा प्यार है मेरा!

आँसुओं के देश में

आँसुओं के देश में

जो कहा रूक-रूक पवन ने
जो सुना झुक-झुक गगन ने,
साँझ जो लिखती अधूरा,
प्रात रँग पाता न पूरा,
आँक डाला लह दृगों ने एक सजल निमेष में!

अतल सागर में जली जो,
मुक्त झंझा पर चली जो,
जो गरजती मेघ-स्वर में,
जो कसकती तड़ित्-उर में,
प्यास वह पानी हुई इस पुलक के उन्मेष में!

दिश नहीं प्राचीर जिसको,
पथ नहीं जंजीर जिसको
द्वार हर क्षण को बनाता,
सिहर आता बिखर जाता,
स्वप्न वह हठकर बसा इस साँस के परदेश में!

मरण का उत्सव है,
गीत का उत्सव का अमर है,
मुखर कण का संग मेला,
पर चला पंथी अकेला,
मिल गया गन्तव्य, पग को कंटकों के वेष में!

यह बताया झर सुमन ने,
वह सुनाया मूक तृण ने,
वह कहा बेसुध पिकी ने,
चिर पिपासित चातकी ने,
सत्य जो दिव कह न पाया था अमिट संदेश में!

खोज ही चिर प्राप्ति का वर,
साधना ही सिद्धि सुन्दर,
रुदन में कुख की कथा हे,
विरह मिलने की प्रथा हे,
शलभ जलकर दीप बन जाता निशा के शेष में!

आँसुओं के देश में!

गोधूली अब दीप जगा ले

गोधूली अब दीप जगा ले!
नीलम की निस्मीम पटी पर,
तारों के बिखरे सित अक्षर,
तम आता हे पाती में,
प्रिय का आमन्त्र स्नेह-पगा ले!

कुमकुम से सीमान्त सजीला,
केशर का आलेपन पीला,
किरणों की अंजन-रेखा
फीके नयनों में आज लगा ले!

इसमें भू के राग घुले हैं,
मूक गगन के अश्रु घुले है,
रज के रंगों में अपना तू
झीना सुरभि-दुकूल रँगा ले!

अब असीम में पंख रुक चले,
अब सीमा में चरण थक चले,
तू निश्वास भेज इनके हित
दिन का अन्तिम हास मँगा ले!

किरण-नाल पर घन के शतदल,
कलरव-लहर विहग बुद्-बुद् चल,
क्षितिज-सिन्धु को चली चपल
आभा-सरि अपना उर उमगा ले!

कण-कण दीपक तृण-तृण बाती,
हँस चितवन का स्नेह पिलाती,
पल-पल की झिलमिल लौ में
सपनों के अंकुर आज उगा ले!
गोधूली, अब दीप जगा ले!

अलि कहाँ सन्देश भेजूँ?

अलि कहाँ सन्देश भेजूँ?
मैं किसे सन्देश भेजूँ?

एक सुधि अनजान उनकी,
दूसरी पहचान मन की,
पुलक का उपहार दूँ या अश्रु-भार अशेष भेजूँ!

चरण चिर पथ के विधाता
उर अथक गति नाम पाता,
अमर अपनी खोज का अब पूछने क्या शेष भेजूँ?

नयन-पथ से स्वप्न में मिल,
प्यास में घुल साध में खिल,
प्रिय मुझी में खो गया अब गया अब दूत को किस देश भेजूँ!

जो गया छबि-रूप का घन,
उड़ गया घनसार-कण बन,
उस मिलन के देश में अब प्राण को किस वेश भेजूँ!

उड़ रहे यह पृष्ठ पल के,
अंक मिटते श्वास चल के,
किस तरह लिख सजल करुणा की व्यथा सविशेष भेजूँ!

 फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?

फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?

इन तलवों में गति-परमिल है,
झलकों में जीवन का जल है,
इनसे मिल काँटे उड़ने को रोये झरने को मुसकाये!

ज्वाला के बादल ने घिर नित,
बरसाये अभिशाप अपरिमित,
वरदानों में पुलके वे जब इस गीले अंचल में आये!

मरु में रच प्यासों की वेला,
छोड़ा कोमल प्राण अकेला,
पर ज्वारों की तरणी ले ममता के शत सागर लहराये!

घेरे लोचन बाँधे स्पन्दन,
रोमों से उलझाये बन्धन,
लघु तृण से तारों तक बिखरी ये साँसें तुम बाँध न पाये!

देता रहा क्षितिज पहरा-सा,
तम फैला अन्तर गहरा-सा,
पर मैंने युग-युग से खोये सब सपने इस पार बुलाये!

मेरा आहत प्राण न देखो,
टूटा स्वर सन्धान न लेखो,
लय ने बन-बन दीप जलाये मिट-मिट कर जलजात खिलाये!

फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?

मैं पलकों में पाल रही हूँ यह सपना सुकमार किसी का!

मैं पलकों में पाल रही हूँ यह सपना सुकमार किसी का!

जाने क्यों कहता है कोई,
मैं तम की उलझन में खोई,
धूममयी वीथी-वीथी में,
लुक-छिप कर विद्युत् सी रोई;
मैं कण-कण में ढाल रही अलि आँसू के मिस प्यार किसी का!

रज में शूलों का मृदु चुम्बन,
नभ में मेघों का आमंत्रण,
आज प्रलय का सिन्धु कर रहा
मेरी कम्पन का अभिनन्दन!
लाया झंझा-दूत सुरभिमय साँसों का उपहार किसी का!

पुतली ने आकाश चुराया,
उर विद्युत्-लोक छिपाया,
अंगराग सी है अंगों में
सीमाहीन उसी की छाया!
अपने तन पर भासा है अलि जाने क्यों श्रृंगार किसी का!

मैं कैसे उलझूँ इति-अथ में,
गति मेरी संसृति है पथ में,
बनता है इतिहास मिलन का
प्यास भरे अभिसार अकथ में!
मेरे प्रति पग गर बसता जाता सूना संसार किसी का!

पथ मेरा निर्वाण बन गया

पथ मेरा निर्वाण बन गया !
प्रति पग शत वरदान बन गया !

आज थके चरों ने सूने तम में विद्युतलोक बसाया,
बरसाती है रेणु चांदनी की यह मेरी धूमिल छाया,
प्रलय-मेघ भी गले मोतियों
की हिम-तरल उफान बन गया !

अंजन -वन्दना चकित दिशाओं ने चित्रित अवगुंठन डाले
रजनी ने मक्रत-वीणा पर हँस किरणों के तार-संभाले,
मेरे स्पंदन से झंझा का
हर-हर लय-संधान बन गया !

पारद-सी गल हुई शिलाएं दुर्गम नभ चन्दन-आँगन-सा,
अंगराग घनसार बनी रज, आतप सौरभ -आलेपन-सा,
शूलों का विष मृदु कलियों के
नव मधुपर्क समान बन गया !

मिट-मिटकर हर सांस लिख रही शत-शत मिलन-विरह का लेखा,
निज को खोकर निमिष आंकते अनदेखे चरणों की रेखा,
पल भर का वह स्वप्न तुम्हारी
युग युग की पहचान बन गया !

देते हो तुम फेर हास मेरा निज करुणा-जलकणमय कर,
लौटाते ही अश्रु मुझे तुम अपनी स्मित के रंगों में भर,
आज मरण का दूत तुम्हें छू
मेरा पाहुन प्राण बन गया !

तू भू के प्राणों का शतदल

तू भू के प्राणों का शतदल !

सित क्षीर-फेन हीरक-रज से
जो हुए चाँदनी में निर्मित,
शरद की रेखायों में चिर
चाँदी के रंगों से चित्रित,
खुल रहे दलों पर दल झलमल !

सपनों से सुरभित दृगजल ले
धोने मुख नित रजनी आती,
उड़ते रंगों के अंचल से
फिर पोंछ उषा संध्या जाती,
तू चिर विस्मित तू चिर उज्जवल !

सीपी से नीलम से घुतिमय,
कुछ पिंग अरुण कुछ सित श्यामल,
कुछ सुख-चंचल कुछ टुख-मंथर
फैले तम से कुछ तल वरल,
मंडराते शत-शत अलि बादल !

युगव्यापी अनगिन जीवन के
अर्चन से हिम-श्रृंगार किये,
पल-पल विहसित क्षण-क्षण विकसित
बिन मुरझाये उपहार लिये,
घेरे है तू नभ के पदतल !

ओ पुलकाकुल, तू दे दिव को
नत भू के प्राणों का परिचय,
कम्पित, उर विजड़ित अधरों की
साधों का चिरजीवित संचय,
तू वज्र-कठिन किशलय–कोमल?
तू भू के प्राणों का शतदल?

सजल है कितना सवेरा

सजल है कितना सवेरा

गहन तम में जो कथा इसकी न भूला
अश्रु उस नभ के, चढ़ा शिर फूल फूला
झूम-झुक-झुक कह रहा हर श्वास तेरा

राख से अंगार तारे झर चले हैं
धूप बंदी रंग के निर्झर खुले हैं
खोलता है पंख रूपों में अंधेरा

कल्पना निज देखकर साकार होते
और उसमें प्राण का संचार होते
सो गया रख तूलिका दीपक चितेरा

अलस पलकों से पता अपना मिटाकर
मृदुल तिनकों में व्यथा अपनी छिपाकर
नयन छोड़े स्वप्न ने खग ने बसेरा

ले उषा ने किरण अक्षत हास रोली
रात अंकों से पराजय राख धो ली
राग ने फिर साँस का संसार घेरा

अलि, मैं कण-कण को जान चली

अलि, मैं कण-कण को जान चली,
सबका क्रन्दन पहचान चली।

जो दृग में हीरक-जल भरते,
जो चितवन इन्द्रधनुष करते,
टूटे सपनों के मनको से,
जो सुखे अधरों पर झरते।

जिस मुक्ताहल में मेघ भरे,
जो तारो के तृण में उतरे,
मै नभ के रज के रस-विष के,
आँसू के सब रँग जान चली।

जिसका मीठा-तीखा दंश न,
अंगों मे भरता सुख-सिहरन,
जो पग में चुभकर, कर देता,
जर्जर मानस, चिर आहत मन।

जो मृदु फूलो के स्पन्दन से,
जो पैना एकाकीपन से,
मै उपवन निर्जन पथ के हर,
कंटक का मृदु मन जान चली।

गति का दे चिर वरदान चली,
जो जल में विद्युत-प्यास भरा,
जो आतप मे जल-जल निखरा,
जो झरते फूलो पर देता,
निज चन्दन-सी ममता बिखरा।

जो आँसू में धुल-धुल उजला,
जो निष्ठुर चरणों का कुचला,
मैं मरु उर्वर में कसक भरे,
अणु-अणु का कम्पन जान चली,
प्रति पग को कर लयवान चली।

नभ मेरा सपना स्वर्ण रजत,
जग संगी अपना चिर विस्मित,
यह शूल-फूल कर चिर नूतन,
पथ, मेरी साधों से निर्मित।

इन आँखों के रस से गीली,
रज भी है दिल से गर्वीली,
मै सुख से चंचल दुख-बोझिल,
क्षण-क्षण का जीवन जान चली,
मिटने को कर निर्माण चली!

Leave a Reply