दिव्य दीवाली चौपदे -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

दिव्य दीवाली चौपदे -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

क्यों नहीं लक्ष्मी रूठेगी।
जब कि कौड़ी के तीन बने।
मालपूआ कैसे खाते।
न मिलते हैं मूठी भर चने।1।

बच सकेगी तब पत कैसे।
कान जो जाते हैं कतरे।
न जूआ जो छूटा तो क्यों।
गले पर का जूआ उतरे।2।

जो रही सोरही भाती तो।
किसे त्योहार कभी सहता।
हार पर हार न जो होती।
भाग तो क्यों सोता रहता।3।

पास जिसके न रही कौड़ी।
कब बना वह पैसे वाला।
मनाए तब क्यों दीवाली।
निकलता जबकि है दिवाला।4।

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