दिल बहलता है कहाँ अंजुमो-महताब से भी-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

दिल बहलता है कहाँ अंजुमो-महताब से भी-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

दिल बहलता है कहाँ अंजुमो-महताब से भी
अब तो हम लोग गए दीद-ए-बेख़्वाब से भी

रो पड़ा हूँ तो कोई बात ही ऐसी होगी
मैं कि वाक़िफ़ था तिरे हिज्र के आदाब से भी

कुछ तो इस आँख का शेवा है ख़फ़ा हो जाना
और कुछ भूल हुई है दिले-बेताब से भी

ऐ समन्दर की हवा तेरा करम भी मालूम
प्यास साहिल की तो बुझती नहीं सैलाब से भी

कुछ तो उस हुस्न को जाने है ज़माना सारा
और कुछ बात चली है मिरे अहबाब से भी

दिल कभी ग़म के समुंदर का शनावर था ‘फ़राज़’
अब तो ख़ौफ़ आता है इक मौज-ए-पायाब से भी

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