दिलबरी-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

दिलबरी-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

है दाम बिछा उसकी जुल्फ़ों के हर इक बल में।
जादू है निगाहों में औ सहर है काजल में॥
सर पावों से शोख़ी है उस चुलबुले चंचल में।
चितवन की लगावट ने एक आन की छल बल में॥
पलकों की झपक दिखला दिल छल लिया इक पल में।

करने से खबरदारी हरगिज न हुआ लाहा॥
और एक के सीने को अय्यार ने ले राहा।
उस शोख़ सितमगर ने गम्जे़ से जो नहीं चाहा॥
की यारों से कुछ फुर्ती क्या कहिए अहा! हा! हा!
पलकों की झपक दिखला दिल छल लिया इक पल में॥

क्या पेश चले उससे यूँ नाज़ भरा हो जो।
किस तौर सरक जाये होना हो तो कुछ हो सो॥
ये घात ये चंचलपन कब याद परी को हो।
इस ढब के तईं यारो देखो तो उहो! हो! हो!॥
पलकों की झपक दिखला दिल छल लिया इक पल में॥

हँस-हँस के लगा जिस दम वह नाज़ो अदा करने।
जी उसकी लगावट से हर लहज़ा लगा डरने॥
हर आन लगी उसकी सौ मक्र के दम भरने।
क्या काम किया यारो उस शोख़ सितमगर ने॥
पलकों की झपक दिखला दिल छल लिया इक पल में॥

डरते थे बहुत हम तो उस शोख़ लड़ाके से।
और खौफ़ में थे उसके ढब आनो अदा के से॥
आया जो इधर को था अय्यार लपाके से।
नज़रों को मिलाते ही चंचल ने छपाके से॥
पलकों की झपक दिखला दिल छल लिया इक पल में॥

रखते थे बहुत हम तो हर आन की होशियारी।
खू़बाँ से न मिलते थे ता हो न गिरफ़्तारी॥
आज उस बुत पुरफ़न ने आकर यह तरहदारी।
जुल दे के हमें लपझप कुछ करके फसूंकारी॥
पलकों की झपक दिखला दिल छल लिया इक पल में॥

समझे थे उसे हम तो महबूब ये भोला है।
जो मक्र है और फ़न है हर्गिज नहीं आता है॥
ये बात न समझे थे जो सहर का नक़्शा है।
क्या कहिए “नज़ीर” आगे ये ज़ोर तमाशा है॥
पलकों की झपक दिखला दिल छल लिया इक पल में॥

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