दिलदार देखना-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz 

दिलदार देखना-सरे-वादी-ए-सीना -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

तूफ़ां-ब-दिल है हर कोई दिलदार देखना
गुल हो न जाये मशअले-रुख़सार देखना

आतिश-ब-जां है न कोई सरकार देखना
लौ के उठे न तुररा-ए-तररार देखना

जज़बे-मुसाफ़िराने-रहे-यार देखना
सर देखना, न संग न दीवार देखना

कूए-जफ़ा में कहते-ख़रीदार देखना
हम आ गये तो गरमीए-बाज़ार देखना

उस दिलनवाज़े-शहर के अतवार देखना,
बेइलतिफ़ात बोलना, बेज़ार देखना

ख़ाली हैं गरचे मसनदो-मिम्बर, निगूं ख़लक
रूआबे-कबा व हयबते-दस्तार देखना

जब तक नसीब था तिरा दीदार देखना
जिस सिमत देखना गुलो-गुलज़ार देखना

हम फिर तमीज़े-रोज़ो-महो-साल कर सके
ऐ यादे-यार फिर इधर इक बार देखना

१९६७

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