दाल-भात खाता है कौआ-खुली आँखें खुले डैने -केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

दाल-भात खाता है कौआ-खुली आँखें खुले डैने -केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

दाल-भात खाता है कौआ
मनुष्य को खाता है हौआ
नकटा है नेता धनखौआ
न कटा हो मानो कनकौआ

रचनाकाल: २१-०१-१९६९

 

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