दस मिरगी सहजे बंधि आनी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

दस मिरगी सहजे बंधि आनी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

दस मिरगी सहजे बंधि आनी ॥
पांच मिरग बेधे सिव की बानी ॥१॥
संतसंगि ले चड़िओ सिकार ॥
म्रिग पकरे बिनु घोर हथीआर ॥१॥ रहाउ ॥
आखेर बिरति बाहरि आइओ धाइ ॥
अहेरा पाइओ घर कै गांइ ॥२॥
म्रिग पकरे घरि आणे हाटि ॥
चुख चुख ले गए बांढे बाटि ॥३॥
एहु अहेरा कीनो दानु ॥
नानक कै घरि केवल नामु ॥4॥4॥1136॥

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