दर्दनामा-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

दर्दनामा-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

बीता दिन
मुबारक नहीं था
रक्तरंजित था
टुकड़े टुकड़े बोटी बोटी
फ़र्ज़ थे सारी सड़क पर फैले
टूटे दिये बिखरे थे
आस-उम्मीदों वाले
जरूरतों खातिर कच्चे आँगनों ने
भेजा था बेटों को करने कमाई
ये क्यों घर को लाशें आईं
सफेद दुपट्टे देते दुहाई

मेरे हाथ में
अमन का परचम
सच पूछो तो डोल रहा है
जहरी नाग जगा अचानक
रूह के अंदर बैठा था जो
बा-मुश्किल सुलाया था मैंने
जाग गया है जहर उगलता
ये जहरी क्यों मरता नहीं है

हदें-सरहदें सारी
आदमख़ोर चुड़ैलें
ज्यों जंग और गरीबी
सगी हैं दोनों बहनें
बार बार ये खेलें होली
कुर्सी और सरकारें
बोलें एक ही बोली
सीधे मुंह न कोई उतर
खा रही हैं हमारे पुत्र

लाश लपेटने के काम
आते कौमी झंडे
हुकुम हुकुमत व्यस्त खाने में
हलवे-पूरी, अंडे

ओ धरती के बेटो-बेटियो
आदम की संतानो
पूरे आलम को
चीत्कारों में छुपा दर्द
सुनाओ और समझा दो
रावी और झेलम का पानी
उकताया सुन सुन दर्द कहानी
इधर या उधर
अब लाशों के अंबार न लगाओ

नफरत की आग सदा जलाती
सपने सुनहरे सहेजे
चूल्हों में घास उगाती
करे बंद दरवाजे

ये मारक हथियार फाड़ते
हमारे प्यारे बस्ते
बम्ब-बंदूके खा रही
प्यार, चौरस्ते
कुचले सुर्ख गुलाबों को
न समझें हाथी मस्ते

ओ बंजारों! लाशों वालो
आँख से काली ऐनक हटाओ
कैसे छाती पीट कर रोती
माएं, बहनें, बेटियां
सूखा रहे हो क्यों सबका हिया

तड़क रहे रंग-रँगीले चूड़े और कलीरे
लिपट तिरंगे में
सोए नींद अटूट
जिस बहन के वीरे
सरहदों के आर-पार
ये आवाज़ लगाओ
जात-धर्म के पट्टे हटाओ बरखुरदारो,
अपना भविष्य खुद सँवारो
अंधे बहरे तख़्त-ताज़ तक ये आवाज़ पहुँचाओ

श्मशानों की जलती मिट्टी पुकारे
धरती को न लम्बी सी कोई कब्र बनाओ
होश में आओ!
बाग उजाड़ने वालो सोचो!
बच्चों के मुंह चूरी की जगह
जलते सुर्ख अंगार न डालो।

 

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