दरीचा-ज़िन्दां-नामा-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

दरीचा-ज़िन्दां-नामा-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

गड़ी हैं कितनी सलीबें मिरे दरीचे में
हरेक अपने मसीहा के ख़ूं का रंग लिये
हरेक वसले-ख़ुदावन्द की उमंग लिये

किसी पे करते हैं अबरे-बहार को कुरबां
किसी पे कत्ल महे-ताबनाक करते हैं
किसी पे होती है सरमस्त शाख़सार दो-नीम
किसी पे बादे-सबा को हलाक करते हैं

हर आये दिन ये ख़ुदावन्दगाने-मेहरो-जमाल
लहू में ग़रक मिरे ग़मकदे में आते हैं
और आए दिन मिरी नज़रों के सामने उनके
शहीद जिसम सलामत उठाये जाते हैं

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